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सत्‍य ही शाश्‍वत सत्‍य है

   मानव जीवन में सच्चाई क्या है? मानव जीवन में सच्चाई क्या है?  हमारा शरीर या हमारी आत्मा।  हम जो दृश्य अपनी आँखों से देखते हैं, जो आवा...

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शनिवार, 11 जुलाई 2020

वार्णिक एवं मात्रिक छंद कविताओं के लिये वर्ण एवं मात्रा के गिनती के नियम

कविताओं के लिये वर्ण एवं मात्रा के गिनती के नियम



वर्ण

‘‘मुख से उच्चारित ध्वनि के संकेतों, उनके लिपि में लिखित प्रतिक को ही वर्ण कहते हैं ।’’

हिन्दी वर्णमाला में 53 वर्णो को तीन भागों में भाटा गया हैः

1. स्वर-

अ,आ,इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ए,ऐ,ओ,औ. अनुस्वार-अं. अनुनासिक-अँ. विसर्ग-अः
2. व्यंजनः
क,ख,ग,घ,ङ, च,छ,ज,झ,ञ. ट,ठ,ड,ढ,ण,ड़,ढ़, त,थ,द,ध,न, प,फ,ब,भ,म, य,र,ल,व,श,ष,स,ह,
3. संयुक्त वर्ण-
क्ष, त्र, ज्ञ,श्र

वर्ण गिनने नियम-

1. हिंदी वर्णमाला के सभी वर्ण चाहे वह स्वर हो, व्यंजन हो, संयुक्त वर्ण हो, लघु मात्रिक हो या दीर्घ मात्रिक सबके सब एक वर्ण के होते हैं ।
2. अर्ध वर्ण की कोई गिनती नहीं होती ।


उदाहरण- 
कमल=क+ म+ल=3 वर्ण
पाठषला= पा +ठ+ षा+ ला =4 वर्ण
रमेश=र+मे+श=3 वर्ण
सत्य=सत्+ य=2 वर्ण (यहां आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)
कंप्यूटर=कंम्प्+ यू़+ ट+ र=4वर्ण (यहां भी आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)


मात्रा-

वर्णो के ध्वनि संकेतो को उच्चारित करने में जो समय लगता है उस समय को मात्रा कहते हैं ।

यह दो प्रकार का होता हैः
1. लघु- जिस वर्ण के उच्चारण में एक चुटकी बजाने में लगे समय के बराबर समय लगे उसे लघु मात्रा कहते हैं। इसका मात्रा भार 1 होता है ।
2. गुरू-जिस वर्ण के उच्चारण में लघु वर्ण के उच्चारण से अधिक समय लगता है उसे गुरू या दीर्घ कहते हैं ! इसका मात्रा भार 2 होता है ।

लघु गुरु निर्धारण के नियम-

  1. हिंदी वर्णमाला के तीन स्वर अ, इ, उ, ऋ एवं अनुनासिक-अँ लघु होते हैं और इस मात्रा से बनने वाले व्यंजन भी लघु होते हैं । लघु स्वरः-अ,इ,उ,ऋ,अँ लघु व्यंजनः- क, कि, कु, कृ, कँ, ख, खि, खु, खृ, खँ ..इसी प्रकार
  2. इन लघु स्वरों को छोड़कर शेष स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ और अनुस्वार अं गुरू स्वर होते हैं तथा इन से बनने वाले व्यंजन भी गुरु होता है ।गुरू स्वरः- आ, ई,ऊ, ए, ऐ, ओ, औ,अं गुरू व्यंजन:- का की, कू, के, कै, को, कौ, कं,........इसी प्रकार
  3. अर्ध वर्ण का स्वयं में कोई मात्रा भार नहीं होता,किन्तु यह दूसरे वर्ण को गुरू कर सकता है । 
  4. अर्ध वर्ण से प्रारंभ होने वाले शब्द में मात्रा के दृष्टिकोण से भी अर्ध वर्ण को छोड़ दिया जाता है । 
  5. किंतु यदि अर्ध वर्ण शब्द के मध्य या अंत में आवे तो यह उस वर्ण को गुरु कर देता है जिस पर इसका      उच्चारण भार पड़ता है । यह प्रायः अपनी बाँई ओर के वर्ण को गुरु करता है । 
  6. यदि जिस वर्ण पर अर्ध वर्ण का भार पड़ रहा हो वह पहले से गुरु है तो वह गुरु ही रहेगा ।
  7. संयुक्त वर्ण में एक अर्ध वर्ण एवं एक पूर्ण होता है, इसके अर्ध वर्ण में उपरोक्त अर्ध वर्ण नियम लागू होता है ।

उदाहरण-
रमेश=र + मे+ श=लघु़+गुरू +लघु=1+2+1=4 मात्रा
सत्य=सत्य+=गुरु+लघु =2+1=3 मात्रा
तुम्हारा=तु़+म्हा+रा=लघु +गुरू+गुरू =1+2+2=5 मात्रा
कंप्यूटर=कंम्प्यू+ट+र=गुरु़+गुरु़+लघु़+लघु=2+2+1+1=6 मात्रा
यज्ञ=यग्य+=गुरू+लघु=2+1=3
क्षमा=क्ष+मा=लघु+गुरू =1+2=3


वर्णिक एवं मात्रिक में अंतर-

जब उच्चारित ध्वनि संकेतो को गिनती की जाती है तो वार्णिक एवं ध्वनि संकेतों के उच्चारण में लगे समय की गणना लघु, गुरू के रूप में की जाती है इसे मात्रिक कहते हैं ! मात्रिक मात्रा महत्वपूर्ण होता है वार्णिक में वर्ण महत्वपूर्ण होता है ।

उदाहरण
रमेश=र + मे+ श=लघु़+गुरू +लघु=1+2+1=4 मात्रा
रमेश=र+मे+श=3 वर्ण

सत्य=सत्य+=गुरु+लघु =2+1=3 मात्रा
सत्य=सत्+ य=2 वर्ण (यहां आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)

कंप्यूटर=कंम्प्यू+ट+र=गुरु़+गुरु़+लघु़+लघु=2+2+1+1=6 मात्रा
कंप्यूटर=कंम्प्+ यू़+ ट+ र=4वर्ण (यहां भी आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)

आशा ही नहीं विश्‍वास है आप वर्ण मात्रा गणना अच्‍छे से सीख गये होंगे ।
-रमेश चौहान

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

घनाक्षरी छंद के मूलभूत नियम एवं प्रकार

घनाक्षरी एक सनातन छंद की विधा होने के बाद भी आज काव्य मंचों में सर्वाधिक पढ़े जाने वाली विधा है । शायद ऐसा कोई काव्य मंच नहीं होगा जिसमें कोई न कोई कवि घनाक्षरी ना पढ़े । 
हिंदी साहित्य के स्वर्णिम युग जिसे एक प्रकार से छंद का युग भी कह सकते हैं, में घनाक्षरी विशेष रूप से प्रचलित रहा है । इस घनाक्षरी छंद की परिभाषा इसके मूलभूत नियम एवं इनके प्रकार पर आज पर चर्चा करेंगे। साथ ही वर्णों की गिनती किस प्रकार की जाती है ? और लघु गुरु का निर्धारण कैसे होता है ? इस पर भी चर्चा करेंगे ।

घनाक्षरी छंद की परिभाषा-
"घनाक्षरी छंद, चार चरणों की एक वर्णिक छंद होता है जिसमें वर्णों की संख्या निश्चित होती है ।" इसे कवित्त भी कहा जाता है और कहीं कहीं पर इसे मुक्तक की भी संज्ञा दी गई है ।

घनाक्षरी छंद के मूलभूत नियम-

1. घनाक्षरी में चार चरण या चार पद होता है।
2. प्रत्येक पद स्वयं चार भागों में बंटे होते हैं इसे यति कहा जाता है ।
3. प्रत्येक चरण के पहले 3 यति पर 8,8,8 वर्ण निश्चित रूप से होते हैं ।
4. चौथे चरण पर 7, 8, या 9 वर्ण हो सकते हैं । इन्हीं वर्णों के अंतर से घनाक्षरी का भेद बनता है ।
5. इस प्रकार घनाक्षरी के प्रत्येक पद में कूल 31,32, या 33 वर्ण होते हैं जो 8,8,8,7 या 8,8,8,8 या 8,8,8,9 वर्ण क्रम में होते हैं ।
6. प्रत्येक पद के चौथे चरण में वर्णों की संख्या और अंत में लघु गुरु के भेद से इसके प्रकार का निर्माण होता है ।
7.इसलिए घनाक्षरी लिखने से पहले घनाक्षरी के भेद और उनकी लघु गुरु के नियम को समझना होगा ।

घनाक्षरी छंद के प्रकार-
घनाक्षरी छंद मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं जिसके चौथे चरण में वर्णों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है ।

  1.  जिसके चौथे चरण में 7 वर्ण हो-

जैसे कि ऊपर देख चुके हैं कि घनाक्षरी छंद में चार चरण होते हैं जिसके पहले तीन चरण में 8,8,8 वर्ण  निश्चित रूप से होते हैैं । किंतु चौथे चरण में वर्णों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है । जब चौथे चरण में 7 वर्ण आवे तो निम्न प्रकार से घनाक्षरी छंद का निर्माण होता है-
  • मनहरण घनाक्षरी-
  • मनहरण घनाक्षरी सर्वाधिक प्रयोग में आई जाने वाली घनाक्षरी है । इसके पहले तीन चरण में 8,8,8 वर्ण निश्चित रूप से होते हैं और सातवें चरण में 7 वर्ण होता है । प्रत्येक चौथे चरण का अंत एक गुरु से होना अनिवार्य होता है । इसके साथ ही चारों चरण में सम तुकांत शब्द आनी चाहिए । यदि प्रत्येक चरण का अंत लघु गुरु से हो तो गेयता की  दृष्टिकोण से अच्छी मानी जाती है।
  • जनहरण घनाक्षरी-
  • जनहरण घनाक्षरी बिल्कुल मनहरण घनाक्षरी जैसा ही है इसके भी पहले तीन चरण में 8,8,8 और चौथे चरण में 7 वर्ण होते हैं और इसका भी अंत एक गुरु से होता है । अंतर केवल इतना ही है के चरण के अंत के गुरु को छोड़ बाकी सभी वर्ण निश्चित रूप से लघु होते हैं । इस प्रकार घनाक्षरी के प्रत्येक चरण में 30 लघु के बाद एक गुरु हो तो जनहरण घनाक्षरी का निर्माण होता है।
  • कलाधर घनाक्षरी-
  • कलाधर घनाक्षरी भी मनहरण एवं जनहरण घनाक्षरी के समान ही होता है जिसके पहले तीन चरण में 8,8,8 वर्ण एवं अंतिम चौथे चरण में 7 वर्ण होते हैं तथा जिसका अंत भी गुरु से ही होता है । अंतर केवल इसमें इतना ही है की यह गुरु से शुरू होकर एकांतर क्रम पर गुरु लघु गुरु लघु गुरु लघु क्रमवार आता है । अर्थात इसमें गुरु लघु की 15 बार आवृत्ति होती है और अंत में गुरु आता है ।

        2.जिस के चौथे चरण में 8 वर्ण होते हैं-

सभी घनाक्षरी के पहले तीन चरण में 8,8,8 वर्ण  ही होते हैं यदि चौथे चरण में भी 8 वर्ण हो तो निम्न प्रकार के घनाक्षरी छंद बनते हैं-
  • रूप घनाक्षरी-रूप घनाक्षरी के चारों चरण में 8,8,8,8 व निश्चित रूप से होते हैं तथा जिसका प्रत्येक चरण का अंत निश्चित रूप से लघु से होता है साथ ही चारों चरण के अंत में समतुकांत शब्द होते हैं ।
  • जलहरण घनाक्षरी-जल हरण घनाक्षरी बिल्कुल रूप घनाक्षरी जैसे ही होता है इसके भी चारों चरण में 8,8,8,8 वर्ण होते हैं और अंतिम भी लघु से होता है ।अंतर केवल इतना होता है कि प्रत्येक चरण के अंतिम लघु से पहले एक और लघु होता है अर्थात प्रत्येक चरण का अंत दो लघु (लघु लघु) से हो तब जलहरण घनाक्षरी बनता है ।
  • डमरु घनाक्षरी-डमरु घनाक्षरी भी जलहरण घनाक्षरी और रूप घनाक्षरी के समान ही होता है जिसके चारों चरण में 8,8,8,8 वर्ण  र्होते हैं तथा अंत भी लघु से होता है । अंतर केवल इतना ही होता है की डमरु घनाक्षरी के सभी  वर्ण लघु होते हैं । इस प्रकार जब 8,8,8,8 क्रम के सभी वर्ण लघु लघु में हो तो डमरू छंद बनता है ।
  • किरपान घनाक्षरी छंद-इसके चारों चरण में 8,8,8,8 वर्ण होने के बाद भी यह पूर्ण रूप से रूपघनाक्षरी, जलहरण घनाक्षरी से भिन्न होता है । इसके प्रत्येक 8 वर्ण में सानुप्रास आना चाहिए अर्थात प्रत्येक यति में 2 शब्द समतुकांत शब्द होनी चाहिए । प्रत्येक चरण का अंत गुरु लघु से होता है 
  • इसे इस उदाहरण से समझ लेते हैं-"बसु वरण वरण, धरी चरण चरण, कर समर बरण, गल धरि किरपान ।यहां  वरण वरण, चरण चरण  और समर बरन में सानुप्रास है ।
  • विजया घनाक्षरी छंद-विजया घनाक्षरी छंद के प्रत्येक चरण में 8, 8,8,8 वर्ण होते हैं । प्रत्येक यति में अर्थात सभी 8 8 वर्ण का अंत नगण (लघु लघु लघु) या लघु गुरु से होना चाहिए ।

    3. जिसके चौथे चरण में 9 वर्ण हो-

    इस प्रकार के घनाक्षरी छंद के पहले तीन चरण में 8,8,8 वर्ण एवं चौथे चरण में 9 वर्ण होते हैं  ।
  • देव घनाक्षरी छंद-छंद में 8,8,8,9 वर्णक्रम होते हैं और प्रत्येक चरण का अंत नगण (लघु लघु लघु) अर्थात तीन बार लघु से होता है ।

  • वर्ण गिनने नियम-

  1. हिंदी वर्णमाला के सभी वर्ण चाहे वह स्वर हो, व्यंजन हो, संयुक्त वर्ण हो, लघु मात्रिक हो या दीर्घ मात्रिक सबके सब एक वर्ण के होते हैं ।
  2. अर्ध वर्ण की कोई गिनती नहीं होती ।
उदाहरण- 
रमेश=र+मे+श=3 वर्ण
सत्य=सत्+य=2 वर्ण (यहां आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)
कंप्यूटर=कंम्प्+यू+ट+र=4वर्ण (यहां भी आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)

लघु गुरु निर्धारण के नियम-

  1. हिंदी वर्णमाला के तीन स्वर अ, इ, उ, लघु होते हैं और इस मात्रा से बनने वाले व्यंजन भी लघू होते हैं 
  2. इन लघु स्वरों को छोड़कर शेष स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ और इन से बनने वाले व्यंजन सभी गुरु होती हैं ।
  3.  चंद्रबिंदु और ऋ की मात्रा जिस पर आवे वह लघु होता है ।
  4. अर्ध वर्ण का स्वयं में कोई भार नहीं होता । इसलिए अर्ध वर्ण से प्रारंभ होने वाले शब्द में मात्रा के दृष्टिकोण से भी अर्ध वर्ण को छोड़ दिया जाता है । 
  5. किंतु यदिअर्ध वर्ण, शब्द के मध्य या अंत में आवे तो यह उस वर्ण को गुरु कर देता है जिस पर इसका उच्चारण भार आवे । या पराया अपनी पाई और के वर्ण को गुरु करता है ।केवल "ह"वर्ण के पहले कोई अर्ध वर्ण आवे तो 'ह' गुरु हो जाता है ।
  6. यदि जिस वर्ण पर अर्ध वर्ण का भार पड़ रहा हो वह पहले से गुरु है तो वह गुरु ही रहेगा ।
उदाहरण-
रमेश=र+म+श=लघु+गुरु+लघु
सत्य=सत्+य=गुरु+लघु
तुम्हारा=तु+म्हा+रा=लघु+गुरु+गुरू
कंप्यूटर=कंम्प्+यू+ट+र=गुरु+गुरु+लघु+लघु
लघु का मात्रा भार एक एवं गुरु का मात्रा भार-2 होता है ।

वर्णिक एवं मात्रिक में अंतर-

जब लघु गुरु में भेद किए बिना ही वर्णों की गिनती की जाती है तो इसे वार्णिक कहते हैं । किंतु जब इसमें लघु एवं गुरु के मात्र का भार क्रम से एक और दो के आधार पर गिनती की जाती है तो इसे मात्रिक कहते हैं ।
उदाहरण
रमेश=र+म+श=लघु+गुरु+लघु=1+2+1=3 3 मात्रा किंतु इसमें तीन वर्ण है ।
सत्य=सत्+य=गुरु+लघु=2+1=3 मात्रा किंतु दो वर्ण
तुम्हारा=तु+म्हा+रा=लघु+गुरु+लघु=1+2+1=4 मात्रा किंग 3 वर्ण
कंप्यूटर=कंम्प्+यू+ट+र=गुरु+गुरु+लघु+लघु=2+2+1+1=6 मात्रा किंतु चार वर्ण ।

घनाक्षरी छंद के उदाहरण-
रखिये चरण चार, चार बार यति धर
तीन आठ हर बार, चौथे सात आठ नौ ।
आठ-आठ आठ-सात, आठ-आठ आठ-आठ
आठ-आठ आठ-नव, वर्ण वर्ण गिन लौ ।।
आठ-सात अंत गुरु, ‘मन’ ‘जन’ ‘कलाधर’,
अंत छोड़ सभी लघु, जलहरण कहि दौ ।
गुरु लघु क्रमवार, नाम रखे कलाधर
नेम कुछु न विशेष, मनहरण गढ़ भौ ।।

आठ-आठ आठ-आठ, ‘रूप‘ रखे अंत लघु
अंत दुई लघु रख, कहिये जलहरण ।
सभी वर्ण लघु भर, नाम ‘डमरू’ तौ धर
आठ-आठ सानुप्रास, ‘कृपाण’ नाम करण ।।
यदि प्रति यति अंत, रखे नगण-नगण
हो ‘विजया’ घनाक्षरी, सुजश मन भरण ।
आठ-आठ आठ-नव, अंत तीन लघु रख
नाम देवघनाक्षरी, गहिये वर्ण शरण ।।
वर्ण-छंद घनाक्षरी, गढ़न हरणमन
नियम-धियम आप, धैर्य धर  जानिए ।।
आठ-आठ आठ-सात, चार बार वर्ण रख
चार बार यति कर,  चार पद तानिए ।।
गति यति लय भर, चरणांत गुरु धर
साधि-साधि शब्द-वर्ण, नेम यही मानिए ।
सम-सम सम-वर्ण, विषम-विषम सम, 
चरण-चरण सब, क्रम यही पालिए ।।

-रमेश चौहान


आशा ही नहीं विश्वास है आप घनाक्षरी छंद को अच्छे से समझ पाए होंगे ।

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

मुक्तक-4 (मात्रा गणना का समान्य नियम)


मात्रा गणना का सामान्य नियम-

क्रमांक १ - सभी व्यंजन (बिना स्वर के) एक मात्रिक होते हैं
जैसे - क, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ, ट ... आदि १ मात्रिक हैं ।
क्रमांक २ - अ, इ, उ स्वर व अनुस्वर चन्द्रबिंदी तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन एक मात्रिक होते हैं ।
जैसे - अ, इ, उ, कि, सि, पु, सु हँ  आदि एक मात्रिक हैं ।
क्रमांक ३ - आ, ई, ऊ ए ऐ ओ औ अं स्वर तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन दो मात्रिक होते हैं
जैसे -आ, सो, पा, जू, सी, ने, पै, सौ, सं आदि २ मात्रिक हैं ।
क्रमांक ४. (१) - यदि किसी शब्द में दो ’एक मात्रिक’ व्यंजन हैं तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक अर्थात दीर्घ बन जाते हैं जैसे ह१+म१ = हम = २  ऐसे दो मात्रिक शाश्वत दीर्घ होते हैं जिनको जरूरत के अनुसार ११ अथवा १ नहीं किया जा सकता है ।
जैसे -सम, दम, चल, घर, पल, कल आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं ।
४. (२) परन्तु जिस शब्द के उच्चारण में दोनो अक्षर अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ दोनों लघु हमेशा अलग अलग अर्थात ११ गिना जायेगा ।
जैसे - असमय = अ/स/मय =  अ१ स१ मय२ = ११२    
क्रमांक ५ (१) किसी लघु मात्रिक के पहले या बाद में कोई शुद्ध व्यंजन हो तो उच्चारण अनुसार दोनों लघु मिल कर शाश्वत दो मात्रिक हो जाता है।
उदाहरण - “तुम” शब्द में “’त’” ’“उ’” के साथ जुड कर ’“तु’” होता है “तु” एक मात्रिक है और “तुम” शब्द में “म” भी एक मात्रिक है और बोलते समय “तु+म” को एक साथ बोलते हैं तो ये दोनों जुड कर शाश्वत दीर्घ बन जाते हैं इसे ११ नहीं गिना जा सकता ।
इसके और उदाहरण देखें - यदि, कपि, कुछ, रुक आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं ।
 ५ (१) परन्तु जहाँ किसी शब्द के उच्चारण में दोनो हर्फ़ अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ अलग अलग ही अर्थात ११ गिना जायेगा
जैसे द-  सुमधुर = सु/ म /धुर = स+उ१ म१ धुर२ = ११२  
क्रमांक ६ (१) - यदि किसी शब्द में अगल बगल के दोनो व्यंजन किन्हीं स्वर के साथ जुड कर लघु ही रहते हैं, तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक हो जाता है इसे ११ नहीं गिना जा सकता ।
जैसे - पुरु = प+उ / र+उ = पुरु = २,  
इसके और उदाहरण देखें = गिरि
६ (२) परन्तु जहाँ किसी शब्द के उच्चारण में दो हर्फ़ अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ अलग अलग ही गिना जायेगा-
जैसे -  सुविचार = सु/ वि / चा / र = स+उ१ व+इ१ चा२ र१ = ११२१
क्रमांक ७ (१) - ग़ज़ल के मात्रा गणना में अर्ध व्यंजन को १ मात्रा माना गया है तथा यदि शब्द में उच्चारण अनुसार पहले अथवा बाद के व्यंजन के साथ जुड जाता है और जिससे जुड़ता है वो व्यंजन यदि १ मात्रिक है तो वह २ मात्रिक हो जाता है और यदि दो मात्रिक है तो जुडने के बाद भी २ मात्रिक ही रहता है ऐसे २ मात्रिक को ११ नहीं गिना जा सकता है
उदाहरण -
सच्चा = स१+च्१ / च१+आ१  = सच् २ चा २ = २२
(अतः सच्चा को ११२ नहीं गिना जा सकता है)
आनन्द = आ / न+न् / द = आ२ नन्२ द१ = २२१  
कार्य = का+र् / य = र्का २  य १ = २१  (कार्य में का पहले से दो मात्रिक है तथा आधा र के जुडने पर भी दो मात्रिक ही रहता है)
तुम्हारा = तु/ म्हा/ रा = तु१ म्हा२ रा२ = १२२
तुम्हें = तु / म्हें = तु१ म्हें२ = १२
उन्हें = उ / न्हें = उ१ न्हें२ = १२
७ (२) अपवाद स्वरूप अर्ध व्यंजन के इस नियम में अर्ध स व्यंजन के साथ एक अपवाद यह है कि यदि अर्ध स के पहले या बाद में कोई एक मात्रिक अक्षर होता है तब तो यह उच्चारण के अनुसार बगल के शब्द के साथ जुड जाता है परन्तु यदि अर्ध स के दोनों ओर पहले से दीर्घ मात्रिक अक्षर होते हैं तो कुछ शब्दों में अर्ध स को स्वतंत्र एक मात्रिक भी माना लिया जाता है
जैसे = रस्ता = र+स् / ता २२ होता है मगर रास्ता = रा/स्/ता = २१२ होता है
दोस्त = दो+स् /त= २१ होता है मगर दोस्ती = दो/स्/ती = २१२ होता है
इस प्रकार और शब्द देखें
सस्ता = २२, दोस्तों = २१२, मस्ताना = २२२, मुस्कान = २२१, संस्कार= २१२१    
क्रमांक ८. (१) - संयुक्ताक्षर जैसे = क्ष, त्र, ज्ञ द्ध द्व आदि दो व्यंजन के योग से बने होने के कारण दीर्घ मात्रिक हैं परन्तु मात्र गणना में खुद लघु हो कर अपने पहले के लघु व्यंजन को दीर्घ कर देते है अथवा पहले का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी स्वयं लघु हो जाते हैं  ।
उदाहरण = पत्र= २१, वक्र = २१, यक्ष = २१, कक्ष - २१, यज्ञ = २१, शुद्ध =२१ क्रुद्ध =२१
गोत्र = २१, मूत्र = २१,
८. (२) यदि संयुक्ताक्षर से शब्द प्रारंभ हो तो संयुक्ताक्षर लघु हो जाते हैं
उदाहरण = त्रिशूल = १२१, क्रमांक = १२१, क्षितिज = १२
८. (३) संयुक्ताक्षर जब दीर्घ स्वर युक्त होते हैं तो अपने पहले के व्यंजन को दीर्घ करते हुए स्वयं भी दीर्घ रहते हैं अथवा पहले का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी दीर्घ स्वर युक्त संयुक्ताक्षर दीर्घ मात्रिक गिने जाते हैं
उदाहरण -प्रज्ञा = २२  राजाज्ञा = २२२,
८ (४) उच्चारण अनुसार मात्रा गणना के कारण कुछ शब्द इस नियम के अपवाद भी है -
उदाहरण = अनुक्रमांक = अनु/क्र/मां/क = २१२१ (’नु’ अक्षर लघु होते हुए भी ’क्र’ के योग से दीर्घ नहीं हुआ और उच्चारण अनुसार अ के साथ जुड कर दीर्घ हो गया और क्र लघु हो गया)      क्रमांक ९ - विसर्ग युक्त व्यंजन दीर्ध मात्रिक होते हैं ऐसे व्यंजन को १ मात्रिक नहीं गिना जा सकता ।
उदाहरण = दुःख = २१ होता है इसे दीर्घ (२) नहीं गिन सकते यदि हमें २ मात्रा में इसका प्रयोग करना है तो इसके तद्भव रूप में ’दुख’ लिखना चाहिए इस प्रकार यह दीर्घ मात्रिक हो जायेगा ।
मात्रा गणना के लिए अन्य शब्द देखें -
तिरंगा = ति + रं + गा =  ति १ रं २ गा २ = १२२    
उधर = उ/धर उ१ धर२ = १२
ऊपर = ऊ/पर = ऊ २ पर २ = २२    
इस तरह अन्य शब्द की मात्राओं पर ध्यान दें =
मारा = मा / रा  = मा २ रा २ = २२
मरा  = म / रा  = म १ रा २ = १२
मर = मर २ = २
सत्य = सत् / य = सत् २ य २ = २१


मात्रा गिराने का नियम-
क्रमांक १ - सभी व्यंजन (बिना स्वर के) एक मात्रिक होते हैं ।
जैसे दृ क, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ, ट ... आदि १ मात्रिक हैं । यह स्वयं १ मात्रिक है ।
क्रमांक २ - अ, इ, उ स्वर व अनुस्वर चन्द्रबिंदी तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन एक मात्रिक होते हैं ।जैसे = अ, इ, उ, कि, सि, पु, सु हँ  आदि एक मात्रिक हैं। यह स्वयं १ मात्रिक है
क्रमांक ३ - आ, ई, ऊ ए ऐ ओ औ अं स्वर तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन दो मात्रिक होते हैं
जैसे = आ, सो, पा, जू, सी, ने, पै, सौ, सं आदि २ मात्रिक हैं ।
इनमें से केवल आ ई ऊ ए ओ स्वर को गिरा कर १ मात्रिक कर सकते है तथा ऐसे दीर्घ मात्रिक अक्षर को गिरा कर १ मात्रिक कर सकते हैं जो “आ, ई, ऊ, ए, ओ“ स्वर के योग से दीर्घ हुआ हो अन्य स्वर को लघु नहीं गिन सकते न ही ऐसे अक्षर को लघु गिन सकते हैं जो ऐ, औ, अं के योग से दीर्घ हुए हों ।
उदाहरण -मुझको २२ को मुझकु२१ कर सकते हैं
आ, ई, ऊ, ए, ओ, सा, की, हू, पे, दो आदि को दीर्घ से गिरा कर लघु कर सकते हैं परन्तु ऐ, औ, अं, पै, कौ, रं आदि को दीर्घ से लघु नहीं कर सकते हैं । स्पष्ट है कि आ, ई, ऊ, ए, ओ स्वर तथा आ, ई, ऊ, ए, ओ तथा व्यंजन के योग से बने दीर्घ अक्षर को गिरा कर लघु कर सकते हैं ।
क्रमांक ४.
४. (१) - यदि किसी शब्द में दो ’एक मात्रिक’ व्यंजन हैं तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक अर्थात दीर्घ बन जाते हैं जैसे ह१+म१ = हम = २  ऐसे दो मात्रिक शाश्वत दीर्घ होते हैं जिनको जरूरत के अनुसार ११ अथवा १ नहीं किया जा सकता है ।
जैसे -सम, दम, चल, घर, पल, कल आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं ।
ऐसे किसी दीर्घ को लघु नहीं कर सकते हैंद्य  दो व्यंजन मिल कर दीर्घ मात्रिक होते हैं तो ऐसे दो मात्रिक को गिरा कर लघु नहीं कर सकते हैं ।
उदहारण = कमल की मात्रा १२ है इसे क१ + मल२ = १२ गिनेंगे तथा इसमें हम मल को गिरा कर १ नहीं कर सकते अर्थात कमाल को ११ अथवा १११ कदापि नहीं गिन सकते ।  
४. (२) परन्तु जिस शब्द के उच्चारण में दोनो अक्षर अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ दोनों लघु हमेशा अलग अलग अर्थात ११ गिना जायेगा ।
जैसे दृ  असमय = अ/स/मय =  अ१ स१ मय२ = ११२    
असमय का उच्चारण करते समय ’अ’ उच्चारण के बाद रुकते हैं और ’स’ अलग अलग बोलते हैं और ’मय’ का उच्चारण एक साथ करते हैं इसलिए ’अ’ और ’स’ को दीर्घ नहीं किया जा सकता है और मय मिल कर दीर्घ हो जा रहे हैं इसलिए असमय का वज्न अ१ स१ मय२ = ११२  होगा इसे २२ नहीं किया जा सकता है क्योकि यदि इसे २२ किया गया तो उच्चारण अस्मय हो जायेगा और शब्द उच्चारण दोषपूर्ण हो जायेगा ।
यहाँ उच्चारण अनुसार स्वयं लघु है अ१ स१ और मय२ को हम ४.१ अनुसार नहीं गिरा सकते  ।   
क्रमांक ५ (१) - जब क्रमांक २ अनुसार किसी लघु मात्रिक के पहले या बाद में कोई शुद्ध व्यंजन(१ मात्रिक क्रमांक १ के अनुसार) हो तो उच्चारण अनुसार दोनों लघु मिल कर शाश्वत दो मात्रिक हो जाता है ।
उदाहरण द- “तुम” शब्द में “’त’” ’“उ’” के साथ जुड कर ’“तु’” होता है(क्रमांक २ अनुसार), “तु” एक मात्रिक है और “तुम” शब्द में “म” भी एक मात्रिक है (क्रमांक १ के अनुसार)  और बोलते समय “तु+म” को एक साथ बोलते हैं तो ये दोनों जुड कर शाश्वत दीर्घ बन जाते हैं इसे ११ नहीं गिना जा सकता । इसके और उदाहरण देखें = यदि, कपि, कुछ, रुक आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं
 ऐसे दो मात्रिक को नहीं गिरा कर लघु नहीं कर सकते ।
५ (१) परन्तु जहाँ किसी शब्द के उच्चारण में दोनो हर्फ़ अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ अलग अलग ही अर्थात ११ गिना जायेगा
जैसे दृ  सुमधुर = सु/ म /धुर = स+उ१ म१ धुर२ = ११२  
यहाँ उच्चारण अनुसार स्वयं लघु है स+उ=१ म१ और धुर२ को हम ५.१ अनुसार नहीं गिरा सकते  ।  
क्रमांक ६ (१) - यदि किसी शब्द में अगल बगल के दोनो व्यंजन किन्हीं स्वर के साथ जुड कर लघु ही रहते हैं (क्रमांक २ अनुसार) तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक हो जाता है इसे ११ नहीं गिना जा सकता ।
जैसे = पुरु = प+उ / र+उ = पुरु = २,  इसके और उदाहरण देखें = गिरि
ऐसे दो मात्रिक को गिरा कर लघु नहीं कर सकते
६ (२) परन्तु जहाँ किसी शब्द के उच्चारण में दो हर्फ़ अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ अलग अलग ही गिना जायेगा ।
जैसे दृ  सुविचार = सु/ वि / चा / र = स+उ१ व+इ१ चा२ र१ = ११२१
यहाँ उच्चारण अनुसार स्वयं लघु है स+उ१ व+इ१    
क्रमांक ७ (१) - ग़ज़ल के मात्रा गणना में अर्ध व्यंजन को १ मात्रा माना गया है तथा यदि शब्द में उच्चारण अनुसार पहले अथवा बाद के व्यंजन के साथ जुड जाता है और जिससे जुड़ता है वो व्यंजन यदि १ मात्रिक है तो वह २ मात्रिक हो जाता है और यदि दो मात्रिक है तो जुडने के बाद भी २ मात्रिक ही रहता है ऐसे २ मात्रिक को ११ नहीं गिना जा सकता है ।
उदाहरण -सच्चा = स१+च्१ / च१+आ१  = सच् २ चा २ = २२ (अतः सच्चा को ११२ नहीं गिना जा सकता है) आनन्द = आ / न+न् / द = आ२ नन्२ द१ = २२१ , कार्य = का+र् / य = र्का २  य १ = २१  (कार्य में का पहले से दो मात्रिक है तथा आधा र के जुडने पर भी दो मात्रिक ही रहता है)
तुम्हारा = तु/ म्हा/ रा = तु१ म्हा२ रा२ = १२२
तुम्हें = तु / म्हें = तु१ म्हें२ = १२
उन्हें = उ / न्हें = उ१ न्हें२ = १२
क्रमांक ७ (१) अनुसार दो मात्रिक को गिरा कर लघु नहीं कर सकते
७ (२) अपवाद स्वरूप अर्ध व्यंजन के इस नियम में अर्ध स व्यंजन के साथ एक अपवाद यह है कि यदि अर्ध स के पहले या बाद में कोई एक मात्रिक अक्षर होता है तब तो यह उच्चारण के अनुसार बगल के शब्द के साथ जुड जाता है परन्तु यदि अर्ध स के दोनों ओर पहले से दीर्घ मात्रिक अक्षर होते हैं तो कुछ शब्दों में अर्ध स को स्वतंत्र एक मात्रिक भी माना लिया जाता है ।
जैसे = रस्ता = र+स् / ता २२ होता है मगर रास्ता = रा/स्/ता = २१२ होता है
दोस्त = दो+स् /त= २१ होता है मगर दोस्ती = दो/स्/ती = २१२ होता है
इस प्रकार और शब्द देखें
सस्ता = २२ दोस्तों = २१२मस्ताना = २२२ मुस्कान = २२१      संस्कार= २१२१
क्रमांक ७ (२) अनुसार हस्व व्यंजन स्वयं लघु होता है ।
क्रमांक ८. (१) - संयुक्ताक्षर जैसे = क्ष, त्र, ज्ञ द्ध द्व आदि दो व्यंजन के योग से बने होने के कारण दीर्घ मात्रिक हैं परन्तु मात्र गणना में खुद लघु हो कर अपने पहले के लघु व्यंजन को दीर्घ कर देते है अथवा पहले का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी स्वयं लघु हो जाते हैं  ।
उदाहरण = पत्र= २१, वक्र = २१, यक्ष = २१, कक्ष - २१, यज्ञ = २१, शुद्ध =२१ क्रुद्ध =२१
गोत्र = २१, मूत्र = २१,
क्रमांक ८. (१) अनुसार संयुक्ताक्षर स्वयं लघु हो जाते हैं।
८. (२) यदि संयुक्ताक्षर से शब्द प्रारंभ हो तो संयुक्ताक्षर लघु हो जाते हैं ।
उदाहरण = त्रिशूल = १२१, क्रमांक = १२१, क्षितिज = १२
क्रमांक ८. (२) अनुसार संयुक्ताक्षर स्वयं लघु हो जाते हैं ।
८. (३) संयुक्ताक्षर जब दीर्घ स्वर युक्त होते हैं तो अपने पहले के व्यंजन को दीर्घ करते हुए स्वयं भी दीर्घ रहते हैं अथवा पहले का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी दीर्घ स्वर युक्त संयुक्ताक्षर दीर्घ मात्रिक गिने जाते हैं ।
उदाहरण =प्रज्ञा = २२  राजाज्ञा = २२२, पत्रों = २२  
क्रमांक ८. (३) अनुसार संयुक्ताक्षर स्वर के जुडने से दीर्घ होते हैं तथा यह क्रमांक ३ के अनुसार लघु हो सकते हैं ।
८ (४) उच्चारण अनुसार मात्रा गणना के कारण कुछ शब्द इस नियम के अपवाद भी है -
उदाहरण = अनुक्रमांक = अनु/क्र/मां/क = २१२१ (’नु’ अक्षर लघु होते हुए भी ’क्र’ के योग से दीर्घ नहीं हुआ और उच्चारण अनुसार अ के साथ जुड कर दीर्घ हो गया और क्र लघु हो गया)
क्रमांक ८. (४) अनुसार संयुक्ताक्षर स्वयं लघु हो जाते हैं ।
क्रमांक ९ – विसर्ग युक्त व्यंजन दीर्ध मात्रिक होते हैं ऐसे व्यंजन को १ मात्रिक नहीं गिना जा सकता ।
उदाहरण = दुःख = २१ होता है इसे दीर्घ (२) नहीं गिन सकते यदि हमें २ मात्रा में इसका प्रयोग करना है तो इसके तद्भव रूप में ’दुख’ लिखना चाहिए इस प्रकार यह दीर्घ मात्रिक हो जायेगा ।
क्रमांक ९ अनुसार विसर्ग युक्त दीर्घ व्यंजन को गिरा कर लघु नहीं कर सकते हैं ।
अतः यह स्पष्ट हो गया है कि हम किन दीर्घ को लघु कर सकते हैं और किन्हें नहीं कर सकते, परन्तु यह अभ्यास से ही पूर्णतः स्पष्ट हो सकता है जैसे कुछ अपवाद को समझने के लिए अभ्यास आवश्यक है ।
उदाहरण स्वरूप एक अपवाद देखें - मात्रा गिराने के नियम में बताया गया है कि ’ऐ’ स्वर तथा ’ऐ’ स्वर युक्त व्यंजन को नहीं गिरा सकते हैद्य जैसे - “जै“ २ को गिरा कर लघु नहीं कर सकते परन्तु अपवाद स्वरूप “है“ “हैं“ और “मैं“ को दीर्घ मात्रिक से गिरा कर लघु मात्रिक करने की छूट है ।
कुछ अशआर की तक्तीअ की जाये जिसमें मात्रा को गिराया गया हो -
उदाहरण - १
जिंदगी में / आज पहली / बार मुझको / डर लगा२१२२  /   २१२२   /    २१२२   /   २१२
उसने मुझ पर / फूल फेंका / था मुझे पत् / थर लगा
  २१२२  /   २१२२   /    २१२२   /   २१२
तू मुझे काँ / टा समझता / है तो मुझसे / बच के चल
   २१२२  /   २१२२   /    २१२२   /   २१२
राह का पत् / थर समझता / है तो फिर ठो / कर लगा
   २१२२  /   २१२२   /    २१२२   /   २१२
आगे आगे / मैं नहीं हो / ता कभी नज् / मी मगर
  २१२२  /   २१२२   /    २१२२   /   २१२
आज भी पथ / राव में पह / ला मुझे पत् / थर लगा
  २१२२  /   २१२२   /    २१२२   /   २१२
उदाहरण - २

उसे अबके / वफाओं से / गुज़र जाने / की जल्दी थी
१२२२    /    १२२२   /  १२२२   /   १२२२
मगर इस बा/ र मुझको अप/ ने घर जाने / की जल्दी थी
१२२२    /    १२२२    /    १२२२    /   १२२२
मैं अपनी मुट् / ठियों में कै / द कर लेता / जमीनों को
१२२२     /    १२२२    /    १२२२    /   १२२२
मगर मेरे / क़बीले को / बिखर जाने / की जल्दी थी
१२२२    /    १२२२    /    १२२२    /   १२२२
वो शाखों से / जुदा होते / हुए पत्ते / पे हँसते थे
१२२२    /  १२२२   /  १२२२   /   १२२२
बड़े जिन्दा / नज़र थे जिन / को मर जाने / की जल्दी थी
१२२२    /    १२२२    /    १२२२    /   १२२२

उदाहरण - ३

कैसे मंज़र / सामने आ / ने लगे हैं
  २१२२  /   २१२२   /  २१२२
गाते गाते / लोग चिल्ला / ने लगे हैं
  २१२२  /   २१२२   /  २१२२

अब तो इस ता / लाब का पा / नी बदल दो
      २१२२  /   २१२२   /  २१२२
ये कँवल के /  फूल कुम्हला / ने लगे हैं
    २१२२  /    २१२२   /  २१२२

एक कब्रिस् / तान में घर / मिल रहा है
  २१२२  /   २१२२   /  २१२२
जिसमें तहखा / नों से तहखा / ने लगे हैं
  २१२२  /   २१२२   /  २१२२
इस प्रकार यह स्पष्ट हुआ कि हम किन दीर्घ मात्रिक को गिरा सकते हैं ।
अब मात्रा गिराने को काफी हद तक समझ चुके हैं और यह भी जान चुके हैं कि कौन सा दीर्घ मात्रिक गिरेगा और कौन सा नहीं गिरेगा ।
ब) अब हम इस प्रश्न का उत्तर खोजते हैं कि शब्द में किस स्थान का दीर्घ गिर सकता है और किस स्थान का नहीं गिर सकता -
नियम अ के अनुसार हम जिन दीर्घ को गिरा कर लघु मात्रिक गिन सकते हैं शब्द में उनका स्थान भी सुनिश्चित है अर्थात हम शब्द के किसी भी स्थान पर स्थापित दीर्घ अक्षर को अ नियम अनुसार  नहीं गिरा सकते
उदाहरण - पाया २२ को पाय अनुसार उच्चारण कर के २१ गिन सकते हैं परन्तु पया अनुसार १२ नहीं गिन सकते ।

प्रश्न उठता है कि, जब पा और या दोनों में एक ही नियम (क्रमांक ३ अनुसार) लागू है तो ऐसा क्यों कि ’या’ को गिरा सकते हैं ’पा’ को नहीं ?
इसका उत्तर यह है कि हम शब्द के केवल अंतिम दीर्घ मात्रिक अक्षर को ही गिरा सकते हैं शब्द के आखि़री अक्षर के अतिरिक्त किसी और अक्षर को नहीं गिरा सकते ।
कुछ और उदाहरण देखें -
उसूलों - १२२ को गिरा कर केवल १२१ कर सकते हैं इसमें हम “सू“ को गिरा कर ११२ नहीं कर सकते क्योकि ’सू’  अक्षर शब्द के अंत में नहीं है  ।
तो - २ को गिरा कर १ कर सकते हैं क्योकि यह शब्द का आखि़री अक्षर है ।
बोलो - २२ को गिरा कर २१ अनुसार गिन सकते हैं ।
नोट - इस नियम में कुछ अपवाद भी देख लें -
कोई, मेरा, तेरा शब्द में अपवाद स्वरूप पहले अक्षर को भी गिरा सकते हैं)    
कोई - २२ से गिरा कर केवल २१ और १२ और ११ कर सकते हैं पर यह २ नहीं हो सकता है
मेरा - २२ से गिरा कर केवल २१ और १२ और ११ कर सकते हैं पर यह २ नहीं हो सकता है
तेरा - २२ से गिरा कर केवल २१ और १२ और ११ कर सकते हैं पर यह २ नहीं हो सकता है
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अब यह भी स्पष्ट है कि शब्द में किन स्थान पर दीर्घ मात्रिक को गिरा सकते हैं

स) अब यह जानना शेष है कि किन शब्दों की मात्रा को कदापि नहीं गिरा सकते -

१) हम किसी व्यक्ति अथवा स्थान के नाम की मात्रा कदापि नहीं गिरा सकते
उदाहरण - “मीरा“ शब्द में अंत में “रा“ है जो क्रमांक ३ अनुसार गिर सकता है और शब्द के अंत में आ रहा है इसलिए नियमानुसार इसे गिरा सकते हैं परन्तु यह एक महिला का नाम है इसलिए संज्ञा है और इस कारण हम मीरा(२२) को “मीर“ उच्चारण करते हुए २१ नहीं गिन सकते । “मीरा“ शब्द सदैव २२ ही रहेगा इसकी मात्रा  किसी दशा में नहीं गिरा सकते । यदि ऐसा करेंगे तो शेअर दोष पूर्ण हो जायेगा ।
 “आगरा“ शब्द में अंत में “रा“ है जो क्रमांक ३ अनुसार गिरा सकते है और शब्द के अंत में “रा“ आ रहा है इसलिए नियमानुसार गिरा सकते हैं परन्तु यह एक स्थान का नाम है इसलिए संज्ञा है और इस कारण हम आगरा(२१२) को “आगर“ उच्चारण करते हुए २२ नहीं गिन सकतेद्य “आगरा“ शब्द सदैव २१२ ही रहेगा द्य इसकी मात्रा  किसी दशा में नहीं गिरा सकते द्य यदि ऐसा करेंगे तो शेअर दोष पूर्ण हो जायेगा ।

२) ऐसा माना जाता है कि हिन्दी के तत्सम शब्द की मात्रा भी नहीं गिरानी चाहिए ।
उदाहरण - विडम्बना शब्द के अंत में “ना“ है जो क्रमांक ३ अनुसार गिरा सकते है और शब्द के अंत में “ना“ आ रहा है इसलिए नियमानुसार गिरा सकते हैं परन्तु विडम्बना एक तत्सम शब्द है इसलिए इसकी मात्रा नहीं गिरानी चाहिए  परन्तु अब इस नियम में काफी छूट लिये जाने लगे हैं क्योकि तद्भव शब्दों में भी खूब बदलाव हो रहा है और उसके तद्भव रूप से भी नए शब्द निकालने लगे हैं ।

उदाहरण - दीपावली एक तत्सम शब्द है जिसका तद्भव रूप दीवाली है मगर समय के साथ इसमें भी बदलाव हुआ है और दीवाली में बदलाव हो कर दिवाली शब्द प्रचलन में आया तो अब दिवाली को तद्भव शब्द माने तो उसका तत्सम शब्द दीवाली होगा इस इस अनुसार दीवाली को २२१ नहीं करना चाहिए मगर ऐसा खूब किया जा रहा है  और लगभग स्वीकार्य है द्य मगर ध्यान रहे कि मूल शब्द दीपावली (२२१२) को गिरा कर २२११ नहीं करना चाहिए ।

यह भी याद रखें कि यह नियम केवल हिन्दी के तत्सम शब्दों के लिए है ।  उर्दू के शब्दों के साथ ऐसा कोई नियम नहीं है क्योकि उर्दू की शब्दावली में तद्भव शब्द नहीं पाए जाते ।

(अगर किसी उर्दू शब्द का बदला हुआ रूप प्रचलन में आया है तो वह  शब्द उर्दू भाषा से से किसी और भाषा में जाने के कारण बदला है जैसे उर्दू का अलविदाअ २१२१ हिन्दी में अलविदा २१२ हो गया, सहीह(१२१) बदल कर सही(१२)  हो गया शुरुअ (१२१) बदल कर शुरू(१२) हो गया मन्अ(२१) बदल कर मना(१२) हो गया, और ऐसे अनेक शब्द हैं जिनका स्वरूप बदल गया मगर इनको उर्दू का तद्भव शब्द कहना गलत होगा )

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अब जब सारे नियम साझा हो चुके हैं तो कुछ ऐसे शब्द को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करता हूँ जिनकी मात्रा को गिराया जा सकता है


मेरे मुक्तक
1. पीसो जो मेंहदी तो, हाथ में रंग आयेगा ।
बोये जो धान खतपतवार तो संग आयेगा ।
है दस्तुर इस जहां में सिक्के के होते दो पहलू
दुख सहने से तुम्हे तो जीने का ढंग आयेगा ।।

2. अंधियारा को चीर, एक नूतन सबेरा आयेगा ।
 राह बुनता चल तो सही तू, तेरा बसेरा आयेगा ।।
 हौसला के ले पर, उडान जो तू भरेगा नीले नभ ।
 देख लेना कदमो तले वही नभ जठेरा आयेगा ।

2. क्रोध में जो कापता, कोई उसे भाते नही ।
हो नदी ऊफान पर, कोई निकट जाते नही ।
कौन अच्छा औ बुरा को जांच पाये होश खो
हो घनेरी रात तो साये नजर आते नहीं।

3. कहो ना कहो ना मुझे कौन हो तुम ,
सता कर  सता कर  मुझे मौन हो तुम ।
कभी भी कहीं का किसी का न छोड़े,
करे लोग काना फुसी पौन हो तुम ।।
पौन-प्राण

4. काया कपड़े विहीन नंगे होते हैं ।
झगड़ा कारण रहीत दंगे होते हैं।।
जिनके हो सोच विचार ओछे दैत्यों सा
ऐसे इंसा ही तो लफंगे होते हैं ।।

5. तुम समझते हो तुम मुझ से दूर हो ।
जाकर वहां अपने में ही चूर हो ।।
तुम ये लिखे हो कैसे पाती मुझे,
समझा रहे क्यों तुम अब मजबूर हो ।।

6. बड़े बड़े महल अटारी और मोटर गाड़ी उसके पास
यहां वहां दुकान दारी  और खेती बाड़ी उसके पास ।
बिछा सके कही बिछौना इतना पैसा गिनते अपने हाथ,
नही कही सुकुन हथेली, चिंता कुल्हाड़ी उसके पास ।।

7. तुझे जाना कहां है जानता भी है ।
चरण रख तू डगर को मापता भी है ।।
वहां बैठे हुये क्यों बुन रहे सपना,
निकल कर ख्वाब से तू जागता भी है ।


संकलन-रमेशकुमार सिंह चौहान




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