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सत्‍य ही शाश्‍वत सत्‍य है

   मानव जीवन में सच्चाई क्या है? मानव जीवन में सच्चाई क्या है?  हमारा शरीर या हमारी आत्मा।  हम जो दृश्य अपनी आँखों से देखते हैं, जो आवा...

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

बदलते हुये जीवन के लिये लक्ष्‍य का निर्धारण कैसे करें और उसे कैसे प्राप्‍त करें

बदलते हुये जीवन के लिये  लक्ष्‍य का निर्धारण कैसे करें और उसे कैसे प्राप्‍त करें


How to set Goal  and achieve them for changing lief




दोस्‍तों, जीवन में तो हर कोई Success होना चाहता है किन्‍तु  सभी Success नही हो पाते । जीवन में सफलता प्राप्‍त करना एक art होने के साथ-साथ एक well planed process भी है । यदि हमको जीवन में Success होना है तो इस process को समझना होगा और follow भी करना होगा । दोस्‍तों आज हम इसी topic पर चर्चा करेंगे ।


दोस्‍तों जीवन में सफल होने के लिये सबसे पहले हमें अपने लिये एक लक्ष्‍य , एक Goal तय करना पड़ेगा फिर उस Goal  को  achieve करने के लिये एक  plane बनाना होगा और उस  plane को अच्‍छे से follow करना पड़ेगा । इसी  process को art of life की तरह present करना होगा ।


सबसे पहले देखते हैं कि लक्ष्‍य का निर्धारण कैसे किया जाता है How to set Goal  वास्‍तव में किसी Goal को  achieve करना जितना  कठीन होता है उससे कम कठीन Goal set करना नहीं होता । जैसे एक Shooter को Shoot करने से पहले और कहीं उससे ज्‍यादा  Target  को Focus करने में मेहनत करना पड़ता है । ठीक उसी प्रकार जब हमें Success होना है तो अपने लिये एक Target , एक Goal set करना आवश्‍यक होगा । यदि आपको कहीं जाना हो तो सबसे पहले तो उस स्‍थान को find out करेंगे जहां हमें जाना है फिर वहां जाने के रास्‍ते तलाश करेंगे जब हम पूरी तरह से sure हो जायेंगे तभी चलना प्रारंभ करेंगे । यही Condition Success होने का भी है ।


जीवन के हर मोड़ में Goal अलग प्रकार से हो सकता है । जैसे एक student के लिये परीक्षा में अच्‍छा प्रदर्शन करना Goal  हो सकता है तो Competitive contestant में winer होना Goal  होता है । एक पेशेवर व्‍यक्ति को अपने पेशे शिखर पर, pick  पर पहुँचना ही Goal  होता है ।  सबसे पहले impartent factor तो यही होगा कि हम Goal  को समझें  । for a example  यदि आपको किसी Theater में film देखनी है तो Theater पहुँचना Goal  होगा कि time पर Theater पहुँचना Goal  होगा । यदि आप पूरी film  का लुत्‍फ उठाना चाहते हैं तो time पर Theater पहुँचना Goal  set करना  होगा । इस प्रकार सबसे पहले तो अपने Goal  को पहचानना पड़ेगा । अपने Goal  को पहचान कर लेने पर ही हम अपने लिये Goal set  कर सकते हैं ।


अब प्रश्‍न उठता है अपने लक्ष्‍य का अपने Goal  का पहचान कैसे करें ? जिस विषय में आप सोते जागते सोचते रहते हैं जिसे हर समय पाने के लिये मन में टिस पैदा होता है, वही विषय आपको अपने Goal  पहचान करा सकता है । यदि आप सचमुच उस Undefined Goal  को define करना चाहते है तो आपको अपने उस उत्‍कंठा या attechment को relasie करना पड़ेगा जिसके बारे में सोते-जागते सोचते रहते हैं ।


आपका लक्ष्‍य समय के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं तो एक ही समय पर एक से अधिक लक्ष्‍य भी हो सकते हैं । ये Goal Short term या long term के हो सकते हैं । लेकिन ये सभी Goal एक दूसरे के पूरक होते हैं । जैसे कि यदि कोई Business में अपना Carrier बनाना चाहता है तो Business open करना Short term Goal होगा और Business को Successfully run करना long term Goal होगा किन्‍तु Business open किये बिना Successfully run  करना  possible इसी प्रकार यदि Successfully run  नहीं करना है तो Business open  करने का क्‍या लाभ ? इस प्रकार ये दोनों Goal  एक दूसरे के पूरक हैं, एक दूसरे के Supplement हैं ।


Goal  set कर लेने  के बाद  यह समझना होगा कि  उस Goal को  achieve कैसे करें ?  जिस प्रकार किसी स्‍थान में जानने के लिये उस स्‍थान के पहचान के बाद वहॉं पहुँचने के लिये roadmap चाहिये फिर एक माध्‍यम चाहिये उसी प्रकार Goal  set कर लेने  के बाद  उस Goal  तक पहुँचन के लिये एक roadmap  की जरूरत पड़ती है ।  जिस प्रकार कहीं जाने के हम किसी जानकर रास्‍ता पूछते हैं उसी प्रकार Goal  तक पहुँचन के लिये  किसी जानकर मतलब ऐसे व्‍यक्ति जो अपने Goal को  achieve  कर लिये हैं उनसे  रास्‍ता जानकर  अपने लिये एक एक roadmap  बनाना चाहिये ।


roadmap set कर लेने  के बाद आवश्‍यकता उस पर चलने का, उन उपायों पर follow करने का जिससे हम भी अपने Goal को  achieve कर सकते हैं । इस roadmap पर चलने का साधन हमारा मन और आत्‍म विश्‍वास होता है । जैसे किसी vehicle के माध्‍यम से travle करते हैं, उसी प्रकार Goal को  achieve करने roadmap पर चलने के लिये हमारा मन, हमारा Self-confidence ही एक vehicle या माध्‍यम है । हमारे समाज में कुछ मुहावरे प्रचलित जैसे -मन चंगा तो कठौती में गंगा', 'मन से जीते जीत है मन से हारे हार' ऐसे भी एक अदना सा व्‍यक्ति भी सलाह देते समय यह कह देता है कि मन से काम करो । मन ही आत्‍मविश्‍वास का आधार है मन का मजबूत होना ही Self-confidence इसी vehicle  से हम Goal को  achieve कर सकते हैं ।


इसके अतिरिक्‍त Goal को  achieve करने के लिये एक Plan draw करना चाहिये जिसमें time को underline करना चाहिये । क्‍योंकि समय पर किया गया कार्य का महत्‍व होता है समय निकल जाने के बाद उसका कोई महत्‍व नहीं रह पाता । इसलिये timeplane आवश्‍यक है ।


roadmap set कर लेने  के बाद और Plan draw कर लेने के पश्‍चात उस पर अब चलना आवश्‍यक होता है । इस समय सबसे बड़ा हथियार धैर्य मतलब Patience होता है ।  यह तो जानते और मानते हैं सीढ़ी चढ़ते समय पहली सीढ़ी से दूसरी, फिर तीसर और अंतिम पर पहुँचा जा सकता है सीधे-सीधे आखरी सीढ़ी पर नहीं पहुँचा जा सकता और यदि कोई उछल कर पहुँचने का प्रयास करता है तो गिरने की आशंका होती है । इसलिये step by step हमें Patience रखकर move करना होगा ।


  • यदि इन सारी बातों को pointout  किया जाये तो कुछ इस प्रकार कह सकते हैं -


  1. Identify your goal अपने लक्ष्‍य को पहचाहनये ।

  2. Set your goal अपने लक्ष्‍य को तय कीजिये ।

  3. Learn from successful people सफल व्‍यक्तियों से सीखें

  4. understand how to get success सफलता कैसे प्राप्‍त होता है इसे समझे

  5. make a raodmap and draw a plan एक रास्‍ता का चयन करें और योजना बनायें

  6. Believe in yourself अपने आप पर विश्‍वास करें ।

  7. Be patient धैर्य रखे

  8. Move towards the goal निरंतर लक्ष्‍य की ओर चलें ।

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

वैदिक ज्‍योतिष-एक मूल्‍यांकन

वैदिक संस्‍कृति-

चित्र गुगल से साभार

  • भारतीय संस्‍कृति को वैदिक संस्‍कृति भी कहते हैं क्‍योंकि प्राय: हर बातों का संबंध किसी न किसी रूप में वेदों से जुड़ा होता है । यही कारण है कि कुछ विद्वान यह मानते हैं कि विश्‍व में जो भी ज्ञान है या भविष्‍य में जो भी ज्ञान होने वाला वह सभी ज्ञान वेदों पर ही अवलंबित है अवलंबित रहेंगे । ज्‍योतिष को भी वेदों का ही अंग माना गया है ।


  • वेदों के अँग- वेदों के 6 प्रमुख अंग माने गये हैं । ये हैं- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त,ज्योतिष और छन्द । ज्‍योतिष को वेद का नेत्र कहा गया है । नेत्र का कार्य देखना होता है इस लिये ज्‍योतिष का कार्य भविष्‍य को देखना है  ।


ज्‍योतिष क्‍या है ?

  • ज्‍योतिष का शाब्दिक अर्थ ज्‍योति या प्रकाश करने वाला होता है । वेदो के अनुसार- ''ज्‍योतिषां सूर्यादि ग्रहाणं बोधकं शास्‍त्रम्'' अर्थात ज्‍योतिष सूर्य आदि ग्रहों का बोध कराने वाला शास्‍त्र है । वर्तमान भारतीय ज्‍योतिषाचार्यो के अनुसार -'ज्‍योतिष  ग्रह आदि (राशि, नक्षत्र) और समय का ज्ञान कराने वाला वह विज्ञान है, जो जीवन-मरण के रहस्‍यों और सुख-दुख के संबंध को एक ज्‍योति अर्थात ज्ञान के रूप में प्रस्‍तुत करता है । वास्‍तव ज्‍योतिष गणित विज्ञान का अँग है जो समय और अक्षांश-देशांश के जटिल काल गणानों से प्राप्‍त हाने वाली एक सारणी है जिस सारणी का अर्थ करना फलादेश कहलाता है ।


क्‍या ज्‍योतिष पर विश्‍वास करना चाहिये ?

  • 'देर के ढोल सुहाने' और घर की मुर्गी दाल बराबर'  ये दो कथन हमारे भारतीय समाज में सहज में ही सुनने को मिल जाते हैं । यह अनुभवगम्‍य भी लगता है नई पीढ़ी को  वैचारिक स्‍वतंत्रता के नाम पर विदेशी संस्‍कृती 'दूर के ढोल सुहाने' जैसे रूचिकर लगते हैं और भारतीय संस्‍कृति 'घर की मुर्गी दाल बराबर' लगती है । इस संदर्भ में ऐसे वैचारिक लोगों को अपने आप से एक प्रश्‍न पूछना चाहिये कि Western astrology प्रचलन में क्‍यो है ? Western astrology भी ग्रहों की गणना पर आधरित है जो गणना से अधिक फलादेश कहने पर विश्‍वास करती है । आप पर कोई दबाव नहीं है कि आप ज्‍योतिष पर विश्‍वास करें । हॉं इतना आग्रह जरूर है कि जो ज्‍योतिष पर विश्‍वास करते हैं उनकी आप अवहेलना भी न करें ।


पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष एवं वैदिक ज्‍योतिष में अंतर-

  1. दोनों में पहला अंतर तो समय का ही है । जहॉं वैदिक ज्‍योतिष वैदिक कालिन है वहीं पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष को ग्रीस के बौद्धिक विकास से जोड़ कर देखा जाता है । 

  2. दूसरा प्रमुख अंतर इनके दृष्टिकोण का है जहॉं पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व एवं मनोविज्ञान पर जोर देता है वहीं वैदिक ज्‍योतिष जीवन-मृत्‍यु दोनों का सर्वांग चित्रण करता है ।

  3. पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष सायन सिद्धांत पर आधारित सूर्य प्रधान है जबकि वैदिक  ज्‍योतिष निरयन सिद्धांत पर आधारित नवग्रह, 12 राशि और 27 नक्षत्रों पर विचार करती है । 


वैदिक ज्‍योतिष का महत्‍व-

  • पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष केवल संभावित घटनाओं का प्रत्‍यक्ष चित्रण करने में विश्‍वास करती हैं वही वैदिक ज्‍योतिष  जीवन और जीवन के बाद मृत्‍यु के बारे में सटिक व्‍याख्‍या करने पर जोर देती है । वैदिक ज्‍योतिष में दशा प्रणाली अंतरदशा, महादशा आदि को अपने आप सम्मिलित करती है जो सटिक भविष्‍यवाणी करने में मदद करती है । वेदिक ज्‍योतिष भविष्‍य के उजले पक्ष के साथ-साथ स्‍याह पक्ष को भी उजागर करती है । सबसे बड़ी विशेषता वैदिक ज्‍योतिष समस्‍या को  बतलाने के साथ-साथ उस समस्‍या से निपटने का उपाय भी सुझाती है । 


ज्‍योतिष पर प्रश्‍नवाचक चिन्‍ह क्‍यों ?

  • किसी भी बात पर प्रश्‍न तभी उठााया जाता है जब वह उसके अनुकूल न हो ।  लेकिन ज्‍योतिष के संदर्भ अधिकांश प्रश्‍न ज्‍योतिष के मूल्‍यांकन किये बिना ही उठा दिया जाता है कि यह अंधविश्‍वास है । अंधविश्‍वास वही न होगा जिसका बिना परीक्षण के उस पर विश्‍वास कर लिया जाये । इसी संदर्भ में यह भी तो कहा जाता है जो इसे ज्‍योतिष को अंधविश्‍वास कह रहे हैं वह स्‍वयं तो अंधविश्‍वासी नहीं है किसी न कहा ज्‍योतिष अंधविश्‍वास है और वह बिना परिक्षण किये उसके राग में अपना राग मिला दिये । पहले परीक्षण किया जाना चाहिये फिर परिणाम कहा जाना चाहिये । ज्‍योतिष विज्ञान है या अंध विश्‍वास आपके परीक्षण पर निर्भर करता है ।


  • दूसरी बात जैसे किसी व्‍यक्ति से कहा जाये इस विज्ञान के युग में आप आक्‍सीजन और हाइड्रोजन से पानी बनाकर दिखाओं तो हर कोई पानी बनाकर नहीं दिखा सकता । यदि कोई इससे पानी नहीं बनापाया तो क्‍या विज्ञान झूठा हो गया । जिसप्रकार एक कुशल विज्ञानी ही प्रयोगशाला में आक्‍सीजन और हाइड्रोजन के योग से पानी बना सकता है ठीक उसी प्रकार केवल और केवल एक कुशल ज्‍योतिषाचार्य ही ज्‍योतिष ज्ञान के फलादेश ठीक-ठाक कह सकता है ।


शनिवार, 11 जुलाई 2020

वार्णिक एवं मात्रिक छंद कविताओं के लिये वर्ण एवं मात्रा के गिनती के नियम

कविताओं के लिये वर्ण एवं मात्रा के गिनती के नियम



वर्ण

‘‘मुख से उच्चारित ध्वनि के संकेतों, उनके लिपि में लिखित प्रतिक को ही वर्ण कहते हैं ।’’

हिन्दी वर्णमाला में 53 वर्णो को तीन भागों में भाटा गया हैः

1. स्वर-

अ,आ,इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ए,ऐ,ओ,औ. अनुस्वार-अं. अनुनासिक-अँ. विसर्ग-अः
2. व्यंजनः
क,ख,ग,घ,ङ, च,छ,ज,झ,ञ. ट,ठ,ड,ढ,ण,ड़,ढ़, त,थ,द,ध,न, प,फ,ब,भ,म, य,र,ल,व,श,ष,स,ह,
3. संयुक्त वर्ण-
क्ष, त्र, ज्ञ,श्र

वर्ण गिनने नियम-

1. हिंदी वर्णमाला के सभी वर्ण चाहे वह स्वर हो, व्यंजन हो, संयुक्त वर्ण हो, लघु मात्रिक हो या दीर्घ मात्रिक सबके सब एक वर्ण के होते हैं ।
2. अर्ध वर्ण की कोई गिनती नहीं होती ।


उदाहरण- 
कमल=क+ म+ल=3 वर्ण
पाठषला= पा +ठ+ षा+ ला =4 वर्ण
रमेश=र+मे+श=3 वर्ण
सत्य=सत्+ य=2 वर्ण (यहां आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)
कंप्यूटर=कंम्प्+ यू़+ ट+ र=4वर्ण (यहां भी आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)


मात्रा-

वर्णो के ध्वनि संकेतो को उच्चारित करने में जो समय लगता है उस समय को मात्रा कहते हैं ।

यह दो प्रकार का होता हैः
1. लघु- जिस वर्ण के उच्चारण में एक चुटकी बजाने में लगे समय के बराबर समय लगे उसे लघु मात्रा कहते हैं। इसका मात्रा भार 1 होता है ।
2. गुरू-जिस वर्ण के उच्चारण में लघु वर्ण के उच्चारण से अधिक समय लगता है उसे गुरू या दीर्घ कहते हैं ! इसका मात्रा भार 2 होता है ।

लघु गुरु निर्धारण के नियम-

  1. हिंदी वर्णमाला के तीन स्वर अ, इ, उ, ऋ एवं अनुनासिक-अँ लघु होते हैं और इस मात्रा से बनने वाले व्यंजन भी लघु होते हैं । लघु स्वरः-अ,इ,उ,ऋ,अँ लघु व्यंजनः- क, कि, कु, कृ, कँ, ख, खि, खु, खृ, खँ ..इसी प्रका
  2. इन लघु स्वरों को छोड़कर शेष स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ और अनुस्वार अं गुरू स्वर होते हैं तथा इन से बनने वाले व्यंजन भी गुरु होता है ।गुरू स्वरः- आ, ई,ऊ, ए, ऐ, ओ, औ,अं गुरू व्यंजन:- का की, कू, के, कै, को, कौ, कं,........इसी प्रकार
  3. अर्ध वर्ण का स्वयं में कोई मात्रा भार नहीं होता,किन्तु यह दूसरे वर्ण को गुरू कर सकता है । 
  4. अर्ध वर्ण से प्रारंभ होने वाले शब्द में मात्रा के दृष्टिकोण से भी अर्ध वर्ण को छोड़ दिया जाता है । 
  5. किंतु यदि अर्ध वर्ण शब्द के मध्य या अंत में आवे तो यह उस वर्ण को गुरु कर देता है जिस पर इसका      उच्चारण भार पड़ता है । यह प्रायः अपनी बाँई ओर के वर्ण को गुरु करता है । 
  6. यदि जिस वर्ण पर अर्ध वर्ण का भार पड़ रहा हो वह पहले से गुरु है तो वह गुरु ही रहेगा ।
  7. संयुक्त वर्ण में एक अर्ध वर्ण एवं एक पूर्ण होता है, इसके अर्ध वर्ण में उपरोक्त अर्ध वर्ण नियम लागू होता है ।

उदाहरण-
रमेश=र + मे+ श=लघु़+गुरू +लघु=1+2+1=4 मात्रा
सत्य=सत्य+=गुरु+लघु =2+1=3 मात्रा
तुम्हारा=तु़+म्हा+रा=लघु +गुरू+गुरू =1+2+2=5 मात्रा
कंप्यूटर=कंम्प्यू+ट+र=गुरु़+गुरु़+लघु़+लघु=2+2+1+1=6 मात्रा
यज्ञ=यग्य+=गुरू+लघु=2+1=3
क्षमा=क्ष+मा=लघु+गुरू =1+2=3


वर्णिक एवं मात्रिक में अंतर-

जब उच्चारित ध्वनि संकेतो को गिनती की जाती है तो वार्णिक एवं ध्वनि संकेतों के उच्चारण में लगे समय की गणना लघु, गुरू के रूप में की जाती है इसे मात्रिक कहते हैं ! मात्रिक मात्रा महत्वपूर्ण होता है वार्णिक में वर्ण महत्वपूर्ण होता है ।

उदाहरण
रमेश=र + मे+ श=लघु़+गुरू +लघु=1+2+1=4 मात्रा
रमेश=र+मे+श=3 वर्ण

सत्य=सत्य+=गुरु+लघु =2+1=3 मात्रा
सत्य=सत्+ य=2 वर्ण (यहां आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)

कंप्यूटर=कंम्प्यू+ट+र=गुरु़+गुरु़+लघु़+लघु=2+2+1+1=6 मात्रा
कंप्यूटर=कंम्प्+ यू़+ ट+ र=4वर्ण (यहां भी आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)

आशा ही नहीं विश्‍वास है आप वर्ण मात्रा गणना अच्‍छे से सीख गये होंगे ।
-रमेश चौहान

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

घनाक्षरी छंद के मूलभूत नियम एवं प्रकार

घनाक्षरी एक सनातन छंद की विधा होने के बाद भी आज काव्य मंचों में सर्वाधिक पढ़े जाने वाली विधा है । शायद ऐसा कोई काव्य मंच नहीं होगा जिसमें कोई न कोई कवि घनाक्षरी ना पढ़े । 
हिंदी साहित्य के स्वर्णिम युग जिसे एक प्रकार से छंद का युग भी कह सकते हैं, में घनाक्षरी विशेष रूप से प्रचलित रहा है । इस घनाक्षरी छंद की परिभाषा इसके मूलभूत नियम एवं इनके प्रकार पर आज पर चर्चा करेंगे। साथ ही वर्णों की गिनती किस प्रकार की जाती है ? और लघु गुरु का निर्धारण कैसे होता है ? इस पर भी चर्चा करेंगे ।

घनाक्षरी छंद की परिभाषा-
"घनाक्षरी छंद, चार चरणों की एक वर्णिक छंद होता है जिसमें वर्णों की संख्या निश्चित होती है ।" इसे कवित्त भी कहा जाता है और कहीं कहीं पर इसे मुक्तक की भी संज्ञा दी गई है ।

घनाक्षरी छंद के मूलभूत नियम-

1. घनाक्षरी में चार चरण या चार पद होता है।
2. प्रत्येक पद स्वयं चार भागों में बंटे होते हैं इसे यति कहा जाता है ।
3. प्रत्येक चरण के पहले 3 यति पर 8,8,8 वर्ण निश्चित रूप से होते हैं ।
4. चौथे चरण पर 7, 8, या 9 वर्ण हो सकते हैं । इन्हीं वर्णों के अंतर से घनाक्षरी का भेद बनता है ।
5. इस प्रकार घनाक्षरी के प्रत्येक पद में कूल 31,32, या 33 वर्ण होते हैं जो 8,8,8,7 या 8,8,8,8 या 8,8,8,9 वर्ण क्रम में होते हैं ।
6. प्रत्येक पद के चौथे चरण में वर्णों की संख्या और अंत में लघु गुरु के भेद से इसके प्रकार का निर्माण होता है ।
7.इसलिए घनाक्षरी लिखने से पहले घनाक्षरी के भेद और उनकी लघु गुरु के नियम को समझना होगा ।

घनाक्षरी छंद के प्रकार-
घनाक्षरी छंद मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं जिसके चौथे चरण में वर्णों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है ।

  1.  जिसके चौथे चरण में 7 वर्ण हो-

जैसे कि ऊपर देख चुके हैं कि घनाक्षरी छंद में चार चरण होते हैं जिसके पहले तीन चरण में 8,8,8 वर्ण  निश्चित रूप से होते हैैं । किंतु चौथे चरण में वर्णों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है । जब चौथे चरण में 7 वर्ण आवे तो निम्न प्रकार से घनाक्षरी छंद का निर्माण होता है-
  • मनहरण घनाक्षरी-
  • मनहरण घनाक्षरी सर्वाधिक प्रयोग में आई जाने वाली घनाक्षरी है । इसके पहले तीन चरण में 8,8,8 वर्ण निश्चित रूप से होते हैं और सातवें चरण में 7 वर्ण होता है । प्रत्येक चौथे चरण का अंत एक गुरु से होना अनिवार्य होता है । इसके साथ ही चारों चरण में सम तुकांत शब्द आनी चाहिए । यदि प्रत्येक चरण का अंत लघु गुरु से हो तो गेयता की  दृष्टिकोण से अच्छी मानी जाती है।
  • जनहरण घनाक्षरी-
  • जनहरण घनाक्षरी बिल्कुल मनहरण घनाक्षरी जैसा ही है इसके भी पहले तीन चरण में 8,8,8 और चौथे चरण में 7 वर्ण होते हैं और इसका भी अंत एक गुरु से होता है । अंतर केवल इतना ही है के चरण के अंत के गुरु को छोड़ बाकी सभी वर्ण निश्चित रूप से लघु होते हैं । इस प्रकार घनाक्षरी के प्रत्येक चरण में 30 लघु के बाद एक गुरु हो तो जनहरण घनाक्षरी का निर्माण होता है।
  • कलाधर घनाक्षरी-
  • कलाधर घनाक्षरी भी मनहरण एवं जनहरण घनाक्षरी के समान ही होता है जिसके पहले तीन चरण में 8,8,8 वर्ण एवं अंतिम चौथे चरण में 7 वर्ण होते हैं तथा जिसका अंत भी गुरु से ही होता है । अंतर केवल इसमें इतना ही है की यह गुरु से शुरू होकर एकांतर क्रम पर गुरु लघु गुरु लघु गुरु लघु क्रमवार आता है । अर्थात इसमें गुरु लघु की 15 बार आवृत्ति होती है और अंत में गुरु आता है ।

        2.जिस के चौथे चरण में 8 वर्ण होते हैं-

सभी घनाक्षरी के पहले तीन चरण में 8,8,8 वर्ण  ही होते हैं यदि चौथे चरण में भी 8 वर्ण हो तो निम्न प्रकार के घनाक्षरी छंद बनते हैं-
  • रूप घनाक्षरी-रूप घनाक्षरी के चारों चरण में 8,8,8,8 व निश्चित रूप से होते हैं तथा जिसका प्रत्येक चरण का अंत निश्चित रूप से लघु से होता है साथ ही चारों चरण के अंत में समतुकांत शब्द होते हैं ।
  • जलहरण घनाक्षरी-जल हरण घनाक्षरी बिल्कुल रूप घनाक्षरी जैसे ही होता है इसके भी चारों चरण में 8,8,8,8 वर्ण होते हैं और अंतिम भी लघु से होता है ।अंतर केवल इतना होता है कि प्रत्येक चरण के अंतिम लघु से पहले एक और लघु होता है अर्थात प्रत्येक चरण का अंत दो लघु (लघु लघु) से हो तब जलहरण घनाक्षरी बनता है ।
  • डमरु घनाक्षरी-डमरु घनाक्षरी भी जलहरण घनाक्षरी और रूप घनाक्षरी के समान ही होता है जिसके चारों चरण में 8,8,8,8 वर्ण  र्होते हैं तथा अंत भी लघु से होता है । अंतर केवल इतना ही होता है की डमरु घनाक्षरी के सभी  वर्ण लघु होते हैं । इस प्रकार जब 8,8,8,8 क्रम के सभी वर्ण लघु लघु में हो तो डमरू छंद बनता है ।
  • किरपान घनाक्षरी छंद-इसके चारों चरण में 8,8,8,8 वर्ण होने के बाद भी यह पूर्ण रूप से रूपघनाक्षरी, जलहरण घनाक्षरी से भिन्न होता है । इसके प्रत्येक 8 वर्ण में सानुप्रास आना चाहिए अर्थात प्रत्येक यति में 2 शब्द समतुकांत शब्द होनी चाहिए । प्रत्येक चरण का अंत गुरु लघु से होता है 
  • इसे इस उदाहरण से समझ लेते हैं-"बसु वरण वरण, धरी चरण चरण, कर समर बरण, गल धरि किरपान ।यहां  वरण वरण, चरण चरण  और समर बरन में सानुप्रास है ।
  • विजया घनाक्षरी छंद-विजया घनाक्षरी छंद के प्रत्येक चरण में 8, 8,8,8 वर्ण होते हैं । प्रत्येक यति में अर्थात सभी 8 8 वर्ण का अंत नगण (लघु लघु लघु) या लघु गुरु से होना चाहिए ।

    3. जिसके चौथे चरण में 9 वर्ण हो-

    इस प्रकार के घनाक्षरी छंद के पहले तीन चरण में 8,8,8 वर्ण एवं चौथे चरण में 9 वर्ण होते हैं  ।
  • देव घनाक्षरी छंद-छंद में 8,8,8,9 वर्णक्रम होते हैं और प्रत्येक चरण का अंत नगण (लघु लघु लघु) अर्थात तीन बार लघु से होता है ।

  • वर्ण गिनने नियम-

  1. हिंदी वर्णमाला के सभी वर्ण चाहे वह स्वर हो, व्यंजन हो, संयुक्त वर्ण हो, लघु मात्रिक हो या दीर्घ मात्रिक सबके सब एक वर्ण के होते हैं ।
  2. अर्ध वर्ण की कोई गिनती नहीं होती ।
उदाहरण- 
रमेश=र+मे+श=3 वर्ण
सत्य=सत्+य=2 वर्ण (यहां आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)
कंप्यूटर=कंम्प्+यू+ट+र=4वर्ण (यहां भी आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)

लघु गुरु निर्धारण के नियम-

  1. हिंदी वर्णमाला के तीन स्वर अ, इ, उ, लघु होते हैं और इस मात्रा से बनने वाले व्यंजन भी लघू होते हैं 
  2. इन लघु स्वरों को छोड़कर शेष स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ और इन से बनने वाले व्यंजन सभी गुरु होती हैं ।
  3.  चंद्रबिंदु और ऋ की मात्रा जिस पर आवे वह लघु होता है ।
  4. अर्ध वर्ण का स्वयं में कोई भार नहीं होता । इसलिए अर्ध वर्ण से प्रारंभ होने वाले शब्द में मात्रा के दृष्टिकोण से भी अर्ध वर्ण को छोड़ दिया जाता है । 
  5. किंतु यदिअर्ध वर्ण, शब्द के मध्य या अंत में आवे तो यह उस वर्ण को गुरु कर देता है जिस पर इसका उच्चारण भार आवे । या पराया अपनी पाई और के वर्ण को गुरु करता है ।केवल "ह"वर्ण के पहले कोई अर्ध वर्ण आवे तो 'ह' गुरु हो जाता है ।
  6. यदि जिस वर्ण पर अर्ध वर्ण का भार पड़ रहा हो वह पहले से गुरु है तो वह गुरु ही रहेगा ।
उदाहरण-
रमेश=र+म+श=लघु+गुरु+लघु
सत्य=सत्+य=गुरु+लघु
तुम्हारा=तु+म्हा+रा=लघु+गुरु+गुरू
कंप्यूटर=कंम्प्+यू+ट+र=गुरु+गुरु+लघु+लघु
लघु का मात्रा भार एक एवं गुरु का मात्रा भार-2 होता है ।

वर्णिक एवं मात्रिक में अंतर-

जब लघु गुरु में भेद किए बिना ही वर्णों की गिनती की जाती है तो इसे वार्णिक कहते हैं । किंतु जब इसमें लघु एवं गुरु के मात्र का भार क्रम से एक और दो के आधार पर गिनती की जाती है तो इसे मात्रिक कहते हैं ।
उदाहरण
रमेश=र+म+श=लघु+गुरु+लघु=1+2+1=3 3 मात्रा किंतु इसमें तीन वर्ण है ।
सत्य=सत्+य=गुरु+लघु=2+1=3 मात्रा किंतु दो वर्ण
तुम्हारा=तु+म्हा+रा=लघु+गुरु+लघु=1+2+1=4 मात्रा किंग 3 वर्ण
कंप्यूटर=कंम्प्+यू+ट+र=गुरु+गुरु+लघु+लघु=2+2+1+1=6 मात्रा किंतु चार वर्ण ।

घनाक्षरी छंद के उदाहरण-
रखिये चरण चार, चार बार यति धर
तीन आठ हर बार, चौथे सात आठ नौ ।
आठ-आठ आठ-सात, आठ-आठ आठ-आठ
आठ-आठ आठ-नव, वर्ण वर्ण गिन लौ ।।
आठ-सात अंत गुरु, ‘मन’ ‘जन’ ‘कलाधर’,
अंत छोड़ सभी लघु, जलहरण कहि दौ ।
गुरु लघु क्रमवार, नाम रखे कलाधर
नेम कुछु न विशेष, मनहरण गढ़ भौ ।।

आठ-आठ आठ-आठ, ‘रूप‘ रखे अंत लघु
अंत दुई लघु रख, कहिये जलहरण ।
सभी वर्ण लघु भर, नाम ‘डमरू’ तौ धर
आठ-आठ सानुप्रास, ‘कृपाण’ नाम करण ।।
यदि प्रति यति अंत, रखे नगण-नगण
हो ‘विजया’ घनाक्षरी, सुजश मन भरण ।
आठ-आठ आठ-नव, अंत तीन लघु रख
नाम देवघनाक्षरी, गहिये वर्ण शरण ।।
वर्ण-छंद घनाक्षरी, गढ़न हरणमन
नियम-धियम आप, धैर्य धर  जानिए ।।
आठ-आठ आठ-सात, चार बार वर्ण रख
चार बार यति कर,  चार पद तानिए ।।
गति यति लय भर, चरणांत गुरु धर
साधि-साधि शब्द-वर्ण, नेम यही मानिए ।
सम-सम सम-वर्ण, विषम-विषम सम, 
चरण-चरण सब, क्रम यही पालिए ।।

-रमेश चौहान


आशा ही नहीं विश्वास है आप घनाक्षरी छंद को अच्छे से समझ पाए होंगे ।

मंगलवार, 26 मई 2020

नदी नालों को ही बचाकर जल को बचाया जा सकता है

नदी नालों को ही बचाकर जल को बचाया जा सकता है




भूमि की सतह और भूमि के अंदर जल स्रोतों में अंतर संबंध होते हैं ।जब भूख सतह पर जल अधिक होगा तो स्वाभाविक रूप से भूगर्भ जल का स्तर भी अधिक होगा ।
भू सतह पर वर्षा के जल नदी नालों में संचित होता है यदि नदी नालों की सुरक्षा ना की जाए तो आने वाला समय अत्यंत विकट हो सकता है ।
नदी नालों पर तीन स्तर से आक्रमण हो रहा है-
1. नदी नालों के किनारों पर भूमि अतिक्रमण से नदी नालों की चौड़ाई दिनों दिन कम हो रही है, गहराई भी प्रभावित हो रही है जिससे इसमें जल संचय की क्षमता घट रही है। स्थिति यहां तक निर्मित है कि कई छोटे नदी नाले विलुप्त के कगार पर हैं ।
2. नदी नालों पर गांव, शहर, कारखानों की गंदे पानी गिराए जा रहे हैं ।  जिससे इनके जल विषैले हो रहे हैं जिससे इनके जल जनउपयोगी नहीं होने के कारण लोग इन पर ध्यान नहीं देते और इनका अस्तित्व खतरे में लगातार बना हुआ है ।
3. लोगों में नैतिकता का अभाव भी इसका एक बड़ा कारण है । भारतीय संस्कृति में नदी नालों की पूजा की जाती है जल देवता मानकर उनकी आराधना की जाती है किंतु इनकी सुरक्षा उनके बचाव कि कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेते।

पूरे देश में नदी नालों की स्थिति का आकलन मैं सिर्फ अपने गांव और आसपास को देखकर लगा सकता हूं जिस नदी नाले  में हम बचपन  में तैरा करते थे वहां आज पानी का एक बूंद भी नहीं है ।
नदी तट पर जहां हम खेला करते थे वहां आज कुछ झोपड़ी तो कुछ महल खड़े हो गए हैं ।

कुछ इसी प्रकार की स्थिति गांव और शहर के तालाबों का हो गया है तालाब केवल कूड़ा दान प्रतीत हो रहा है ।
जल स्रोत बचाएं पानी बचाएं ।

शुक्रवार, 22 मई 2020

दीर्घायु जीवन का रहस्य

दीर्घायु जीवन का रहस्य



इस जगत ऐसा कौन नहीं होगा जो लंबी आयु, सुखी जीवन न चाहता हो । प्रत्येक व्यक्ति की कामना होती है कि वह सुखी रहे, जीवन आनंद से व्यतित हो और वह पूर्ण आयु को निरोगी रहते हुये व्यतित करे । मृत्यु तो अटल सत्य है किंतु असमायिक मृत्यु को टालना चाहिये क्योंकि अथर्ववेद में कहा गया है-‘‘मा पुरा जरसो मृथा’ अर्थात बुढ़ापा के पहले मत मरो ।

बुढ़ापा कब आता है ?
  • वैज्ञानिक शोधों द्वारा यह ज्ञात किया गया है कि जब तक शरीर में सेल (कोशिकाओं) का पुनर्निमाण ठीक-ठाक होता रहेगा तब तक शरीर युवावस्था युक्त, कांतियुक्त बना रहेगा । यदि इन सेलों का पुनर्निमाण किन्ही कारणों से अवरूध हो जाता है तो समय के पूर्व शरीर में वृद्धावस्था का लक्षण प्रकट होने लगता है ।
मनुष्य की आयु कितनी है? 
  • वैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय शोधों के अनुसार वर्तमान में मनुष्य की औसत जीवन प्रत्याशा 60 से 70 वर्ष के मध्य है । इस जीवन प्रत्यशा को बढ़ाने चिकित्सकीय प्रयोग निरंतर जारी है ।
  • किन्तु श्रृति कहती है-‘शतायुवै पुरूषः’ अर्थात मनुष्यों की आयु सौ वर्ष निर्धारित है । यह सौ वर्ष बाल, युवा वृद्ध के क्रम में पूर्ण होता है । 
क्या कोई मरना चाहता है ?
  • महाभारत में विदुर जी कहते हैं- ‘अहो महीयसी जन्तोर्जीविताषा बलीयसी’ अर्थात हे राजन जीवन जीने की लालसा अधिक बलवती होती है । 
  • आचार्य कौटिल्य कहते हैं- ‘देही देहं त्यकत्वा ऐन्द्रपदमपि न वांछति’ अर्थात इन्द्र पद की प्राप्ति होने पर भी मनुष्य देह का त्याग करना नहीं चाहता ।
  • आज के समय में भी हम में से कोई मरना नहीं चाहता, जीने का हर जतन करना चाहता है। वैज्ञानिक अमरत्व प्राप्त करने अभीतक कई असफल प्रयास कर चुके हैं और जीवन को सतत् या दीर्घ बनाने के लिये अभी तक प्रयास कर रहे हैं ।
    अकाल मृत्यु क्यों होती है ?
    • यद्यपि मनुष्य का जीवन सौ वर्ष निर्धारित है तथापि सर्वसाधारण का शतायु होना दुर्लभ है । विरले व्यक्ति ही इस अवस्था तक जीवित रह पाते हैं 100 वर्ष के पूर्व अथवा जरा अवस्था के पूर्व मृत्यु को अकाल मृत्यु माना जाता है ।
    • सप्तर्षि में से एक योगवसिष्ठ के अनुसार-
    मृत्यों न किचिंच्छक्तस्त्वमेको मारयितु बलात् ।
    मारणीयस्य कर्माणि तत्कर्तृणीति नेतरत् ।।
    • अर्थात ‘‘हे मृत्यु ! तू स्वयं अपनी शक्ति से किसी मनुष्य को नही मार सकती, मनुष्य किसी दूसरे कारण से नहीं, अपने ही कर्मो से मारा जाता है ।’’ इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि मनुष्य अपनी मृत्यु को अपने कर्मो से स्वयं बुलाता है । जिन साधनों, जिन कर्मो से मनुष्य शतायु हो सकता है उन कारणों के उल्लंघन करके अपने मृत्यु को आमंत्रित करता है ।
    दीर्घायु होने का क्या उपाय है ?
    • विज्ञान के अनुसार जब तक शरीर में कोशिकाओं का पुनर्निमाण की प्रक्रिया स्वस्थ रूप से होती रहेगी तब तक शरीर स्वस्थ एवं युवावस्था युक्त रहेगा । 
    • कोशिकाओं की पुनर्निमाण की सतत प्रक्रिया से वृद्धावस्था असमय नहीं होगा । सेल के पुनर्निमाण में विटामिन ई, विटामिन सी, और कोलिन ये तीन तत्वों का योगदान होता है । इसकी पूर्ती करके दीर्घायु बना जा सकता है ।
    • व्यवहारिक रूप से यदि देखा जाये तो एक साधन संपन्न धनवान यदि इसकी पूर्ती भी कर ले तो क्या वह शतायु बन जाता है ? उत्तर है नहीं तो शतायु कैसे हुआ जा सकता है ।
    • श्री पी.डी.खंतवाल कहते हैं कि -‘‘श्रमादि से लोगों की शक्ति का उतना ह्रास नहीं होता, जितना आलस्य और शारीरिक सुखासक्ति से होता है ।’’ यह कथन अनुभवगम्य भी है क्योंकि अपने आसपास वृद्धों को देखें जो जीनका जीवन परिश्रम में व्यतित हुआ है वह अरामपरस्त व्यक्तियों से अधिक स्वस्थ हैं । इससे यह प्रमाणित होता है कि दीर्घायु जीवन जीने के लिये परिश्रम आवश्यक है ।
    • देखने-सुनने में आता है कि वास्तविक साधु-संत जिनका जीवन संयमित है, शतायु होते हैं इससे यह अभिप्रमाणित होता है कि शतायु होने के संयमित जीवन जीना चाहिये ।
    धर्मशास्त्र के अनुसार दीर्घायु जीवन-
    • महाभारत के अनुसार- ‘‘आचारश्र्च सतां धर्मः ।’’ अर्थात आचरण ही सज्जनों का धर्म है । यहाँ यह रेखांकित करना आवश्यक है कि धर्म कोई पूजा पद्यति नहीं अपितु आचरण है, किये जाने वाला कर्म है । 
    • ‘धर्मो धारयति अति धर्मः’’ अर्थात जो धारण करने योग्य है वही धर्म है । धारण करने योग्य सत्य, दया साहचर्य जैसे गुण हैं एवं धारण करने का अर्थ इन गुणों को अपने कर्मो में परणित करना है ।
    • महाराज मनु के अनुसार- ‘‘आचाराल्लभते ह्यायुः ।’’ अर्थात आचार से दीर्घ आयु प्राप्त होती है ।
    • आचार्य कौटिल्य के अनुसार- ‘‘मृत्युरपि धर्मष्ठिं रक्षति ।’’ अर्थात मृत्यु भी धर्मपरायण लोगों की रक्षा करती है ।
    • ऋग्वेद के अनुसार- ‘न देवानामतिव्रतं शतात्मा च न जीवति ।’’ अर्थात देवताओं के नियमों को तोड़ कर कोई व्यक्ति शतायु नहीं हो सकता । यहाँ देवताओं के नियम को सृष्टि का, प्रकृति का नियम भी कह सकते हैं । 
    • समान्य बोलचाल में पर्यावरणीय संतुलन का नियम ही देवाताओं का नियम है, यही किये जाना वाला कर्म है जो आचरण बन कर धर्म का रूप धारण कर लेता है । अर्थात प्रकृति के अनुकूल आचार-व्यवहार करके दीर्घायु जीवन प्राप्त किया जा सकता है ।
    जीवन की सार्थकता-
    • एक अंग्रेज विचारक के अनुसार- ‘‘उसी व्यक्ति को पूर्ण रूप से जीवित माना जा सकता है, जो सद्विचार, सद्भावना और सत्कर्म से युक्त हो ।’’
    • चलते फिरते शव का कोई महत्व नहीं होता थोडे़ समय में अधिक कार्य करने वाला मनुष्य अपने जीवनकाल को बढ़ा लेता है । आदि शांकराचार्य, स्वामी विवेकानंद जैसे कई महापुरूष अल्प समय में ही बड़ा कार्य करके कम आयु में शरीर त्यागने के बाद भी अमर हैं ।
    • मनुष्यों की वास्तविक आयु उनके कर्मो से मापी जाती है । धर्म-कर्म करने से मनुष्य की आयु निश्चित रूप से बढ़ती है ।
    ‘‘धर्मो रक्षति रक्षितः’’ यदि धर्म की रक्षा की जाये अर्थात धर्म का पालन किया जाये तो वही धर्म हमारी रक्षा करता है । यही जीवन का गुण रहस्य है । यही दीर्घायु का महामंत्र है ।

    शनिवार, 16 मई 2020

    स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता


    हमारे पौराणिक ग्रन्थों में आत्माभिमान की रक्षा करना प्राणों की रक्षा करने से भी श्रेष्ठ कहा गया है । कई ग्रन्थों में यहाँ तक भी कहाँ गया है कि यदि प्राणोत्सर्ग करने से स्वाभिमान की रक्षा हो सके तो सहजता से प्राणोत्सर्ग कर देना चाहिये । स्वाभिमान के पुष्पित पल्लवित वृक्ष पर ही आत्मनिर्भरता का फल लगता है ।

    आत्मनिर्भर किसे कहते हैं ?

    वह व्यक्ति जो अपने प्रत्येक आवश्यकता के पूर्ति किसी दूसरों पर निर्भर न होकर अपने आप पर निर्भर होता है, उसे ही आत्मनिर्भर कहते हैं । जो व्यक्ति अपने हर छोटे-बड़े काम स्वयं करने का प्रयास करते हों, यदि किसी दूसरों की सहायता लेने की आवश्यकता पड़े भी तो उसे वह अर्थ अथवा श्रम विनिमय से ही लेता है । कभी भी किसी से मुफ्त में लेने का प्रयास नहीं करते । न ही अपने धन बल, बाहु बल से दूसरों का शोषण करता है ।
    आत्मनिर्भर होने का यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता वह किसी दूसरे का सहयोग ही न ले । सहयोग ले किन्तु स्वयं भी सहयोग करे । परस्पर सहयोग करने से स्वाभीमान पर चोट नहीं पहुँचेगा और कार्य भी आसानी से हो जायेगा । आत्मनिर्भर व्यक्ति कभी स्वार्थी, स्वकेन्द्रित नहीं हो सकता ।

    आत्मनिर्भरता का महत्व-

    स्वाभिमान व्यक्ति का वह नैतिक गुण है जो उसे नैसर्गिक रूप से स्वालंबी बनाता है, आत्मनिर्भर बनाता है । आत्मनिर्भर व्यक्ति ही सफल होकर उसी प्रकार प्रदीप्मान होता है जैसे करोड़ो तारों के मध्य चन्द्रमा शोभायमान होता है ।
    महाकवि भीमराव के अनुसार-‘लघयन खलु तेजसा जगन्न महा निच्छती भूतिमन्यतः’’ अर्थात अपने तेज और प्रताप से दुनिया को अपने नीचे रखने वाले लोग कभी भी दूसरों का सहारा नहीं लेते अपितु स्वयं के बल पर सब कुछ प्राप्त करते हैं ।
    प्रसिद्ध निबंधकार बालकृष्ण भट्ट आत्मनिर्भरता के संदर्भ में लिखते हैं-‘‘अपने भरोसे का बल है ये जहाँ होंगे जल में तुंबी के समान सबके ऊपर रहेंगे ।’’ अर्थात आत्माभिमानी स्वालंबी संसार में उसी प्रकार ऊपर होते हैं जैसे तुंबी जल में तैरता हुआ ऊपर होता है ।

    आत्मनिर्भर बने कैसें?

    आत्मनिर्भर बनने के लिये व्यक्ति को सबसे पहले शारीरिक एवं मानसिक रूप से सक्षम होना चाहिये । उसे अपने शारीरिक शक्ति एवं मानसिक शक्ति पर स्वयं विश्वास होना चाहिये । यहाँ शारीरिक सक्षमता का अर्थ सबसे बलिष्ठ हो ऐसा नहीं है अपितु अपने कार्य को करने के लिये अपने शरीर को अनुकूल बनाना मात्र है । उसी प्रकार मानसिक सक्षमता अर्थ भी अपने कार्य करने के लिय अपना बौद्धिक विकास करना है ।
    आत्मनिर्भरता व्यक्ति का आंतरिक गुण है, जिसे अभ्यास द्वारा निखारा जा सकता है । छोटी-छोटी बातों पर दूसरों का सहयोग लेने की लालसा छोड़कर स्वयं उसे करने का अभ्यास करना चाहिये ।
    अपने जीवकोपार्जन करने के लिये दूसरों की दया, भीख पर निर्भर न होकर परिश्रमी होना चाहिये । अपने परिश्रम के बल पर अपने अनुकूल कार्य करना चाहिये ।
    कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता हर काम का अपना एक अलग महत्व होता है । जिस काम को हम कर सकते हैं उस काम से अर्थोपार्जन के सारे प्रयास करना चाहिये ।

    आत्मनिर्भरता के पथ के बाधक-

    बाल्यकाल में बच्चों पर माता-पिता का आवश्यकता से अधिक दुलार हर बात पर बच्चों का माता-पिता पर निर्भर होना उसे आत्मनिर्भर होने से रोकता है ।
    आत्मनिर्भर बनने में एक बाधा हमारी शिक्षा का चयन भी है । हमे ऐसे शिक्षा का चयन करना चाहिये जिससे हमारे अंदर कोई न कोई स्कील उत्पन्न हो जिस स्कील की सहायता से हम आर्थोपार्जन कर आत्मनिर्भर हो सकें ।
    अपने आप को श्रेष्ठ मानकर बलपूर्वक या दुराग्रह पूर्वक दूसरों से अपना काम कराने की प्रवृत्ति आत्मनिर्भर होने से रोकता है ।
    वी.वी.आई.पी कल्चर के फेर में दूसरों को अपने अधीन समझने की मनोवृत्ति आत्मनिर्भर होने से उस व्यक्ति को रोकता है ।
    स्वाभीमान ही जीवन है । आत्मनिर्भरता ही सच्ची स्वतंत्रता है । यदि आप स्वतंत्र जीवन जीना चाहते हैं तो स्वाभीमानी एवं स्वालंबी आत्मनिर्भर बनें ।

    सोमवार, 20 अप्रैल 2020

    गैस्ट्रिक का घरेलू उपचार

    गैस्ट्रिक का घरेलू उपचार



    आज के व्यवस्तम काम-काजी परिवेश में लोगों को कई छोटे-बड़े रोग हो रहे है । अब कुछ रोगों का होना जैसे सामान्य बात हो गई है । डाइबिटिज, ब्लड़ प्रेसर जैसे प्रचलित रोगों सा एक रोग गैस्ट्रिक भी है इस रोग में वायु आवश्यकता से अधिक बनता है । यह अनियमित खान-पान के कारण अपच की स्थिति बनने के कारण उत्पन्न होता है ।  कई लोग ऐसे अनुभव करते हैं कि काफी करकेे उपचार कराने पर भी गैस्ट्रिक से छूटकारा नहीं मिल रहा है ।
    यह अनुभव किया गया है कि घर में रात-दिन उपयोग में आनेवाली वस्तुओं से कुछ रोगों में निश्चित रूप से उपयोगी है ।
    गैस्ट्रिक के निदान के लिये आज आयुर्वेद अनुशंसित एक घरेलू उपचार पर चर्चा करेंगे । यह एक अनुभत प्रयोग है । इसे घर में प्रयुक्त अजवाइन और काले नमक से बनाया जा सकता है । इसे बनाने के लिये आवश्यक सामाग्री और बनाने की विधि निम्नानुसार है -

    औषधी निर्माण के लिये आवश्यक सामाग्री-

    1. 250 ग्राम अंजवाइन
    2. 50 ग्राम काला नमक

    औषधी बनाने की विधि-

    1. 250 ग्राम अंजवाइन लेकर इसे साफ कर ले ।
    2. इस अंजवाइन को दो बराबर भागों में बांट दें ।
    3. एक भाग को तेज धूप में अच्छे से सूखा दें ।
    4. इस सूखे हुये अंजवाइन को पीस कर चूर्ण बना लें ।
    5. शेष दूसरे भाग को मध्यम आंच पर तवे में भुन ले ।
    6. इस भुने हुये अंजवाइन को पीस कर चूर्ण बना लें ।
    7. काले नमक को साफ कर पीस कर चूर्ण बना लें ।
    8. आपके पास तीन प्रकार के चूर्ण हो गये हैं-धूप में सूखा अंजवाइन का चूर्ण, भुने हुये अंजवाइन का चूर्ण एवं काले नमक का चूर्ण ।
    9. इन तीनों चूर्णो को आपस में अच्छे से मिला दें ।
    10. इस मिश्रण को एक साफ एवं नमी रहित ढक्कन युक्त कांच के बोतल में रख लें । यह उपयोग हेतु औषधी तैयार हो गया ।

    सेवन विधी- 

    प्रतिदिन दोनों समय भोजन करने के पूर्व एक चाय चम्मच चूर्ण शुद्ध ताजे जल के साथ सेवन करें । भोजन कर लेने के तुरंत पश्चात फिर एक चम्मच इस चूर्ण का सेवन जल से ही करें ।
    इस प्रकार नियमित एक सप्ताह तक सेवन करने से आपको यथोचित लाभ दिखने लगे गा ।

    पथ्य-अपथ्य-

    कोई भी औषधी तभी कारगर होता है जब उसका नियम पूर्वक सेवन किया जाये । औषधि सेवन के दौरान क्या खाना चाहिये और क्या नही खाना चाहिये इसका ध्यान रखा जाये ।

    औषधी सेवन काल में गरिष्ठ भोजन जैसे अधिक तेल, मिर्च-मसाले वाले भोजन न करें साथ ही उड़द की दाल, केला, बैंगन, भैंस का दुगध उत्पाद का सेवन न करें ।  इस अवधी में चावल न लें अथवा कम लें चावल के स्थान पर रोटी का सेवन अधिक लाभकारी होगा ।

    घरेलू उपचार प्राथमिक उपचार के रूप में सुझाया गया है । इसका सेवन करना या न करना आपके विवेक  पर निर्भर करता है । हाँ, यह अवश्य है इस औषधी से निश्चित रूप लाभ होगा । इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है । फिर भी आपके रोग की जानकारी आपको एवं आपके डाक्टर को ही अच्छे से है इसलिये अपने डाक्टर का सलाह अवश्य लें ।

    शनिवार, 18 अप्रैल 2020

    तुलसी के स्वास्थ्यवर्धक गुण


    तुलसी के स्वास्थ्यवर्धक गुण


    तुलसी एक उपयोगी वनस्पति है । भारत सहित विश्व के कई  देशों में तुलसी को पूजनीय तथा शुभ माना जाता है ।  यदि तुलसी के साथ प्राकृतिक चिकित्सा की कुछ पद्यतियां जोड़ दी जायें तो प्राण घातक और असाध्य रोगों  को भी नियंत्रित किया जा सकता है । तुलसी शारीरिक व्याधियों को दूर करने के साथ-साथ मनुष्यों के आंतरिक शोधन में भी उपयोगी है । प्रदूषित वायु के शुद्धिकरण में तुलसी का विलक्षण योगदान है । तुलसी की पत्ती, फूल, फल , तना, जड़ आदि सभी भाग उपयोगी होते हैं ।

    तुलसी पौधे का परिचय-

    तुलसी का वनस्पतिक नाम ऑसीमम सैक्टम है । यह एक द्विबीजपत्री तथा शाकीय, औषधीय झाड़ी है। इसकी ऊँचाई 1 से 3 फिट तक होती है। इसकी पत्तियाँ बैंगनी रंग की होती जो हल्के रोएं से ढकी रहती है । पुष्प कोमल और बहुरंगी छटाओं वाली होती है, जिस पर बैंगनी और गुलाबी आभा वाले बहुत छोटे हृदयाकार पुष्प चक्रों में लगते हैं। बीज चपटे पीतवर्ण के छोटे काले चिह्नों से युक्त अंडाकार होते हैं। नए पौधे मुख्य रूप से वर्षा ऋतु में उगते है और शीतकाल में फूलते हैं। पौधा सामान्य रूप से दो-तीन वर्षों तक हरा बना रहता है।

    तुलसी की प्रजातियां-

    ऐसे तो तुलसी की कई प्रजातियां हैं किन्तु मुख्य रूप से 4 प्रजातियां पाई जाती है-

    1. रामा तुलसी (OCIMUM SANCTUM)

    -रामा तुलसी भारत के लगभग हर घर में पूजी जाने वाली  एक पवित्र पौधा है । इस पौधे के पत्तियां हरी होती हैं । इसे प्रतिदिन पानी की आवश्यकता होती है ।

    2. श्यामा तुलसी (OCIMUM TENUIFLORUM)--

    इस पौधे की पत्तियां बैंगनी रंग की होती है ।  जिसमें छोटे-छोटे रोएं पाये जाते हैं । अन्य प्रजातियों की तुलना में इसमें औषधीय गुण अधिक होते हैं ।

    3- अमुता तुलसी (OCIMUM TENUIFLORUM)-

    यह आम तौर पर कम उगने वाली, सुगंधित और पवित्र प्रजाति का पौधा है ।

    4. वन तुलसी (OCIMUM GRATISSUM)-

    यह भारत में पाये जाने वाली सुगंधित और पवित्र प्रजाति है । अपेक्षाकुत इनकी ऊँचाई अधिक होती है । तना भाग अधिक होता है, इसलिये इसे वन तुलसी कहते हैं 


    धार्मिक महत्व-

    1. भगवान विष्णु की पूजा  तुलसी के बिना पूर्ण नहीं होता ।  भगवान को नैवैद्य समर्पित करते समय तुलसी भेट किया जाता है ।
    2. तुलसी के तनों को दानों के रूप में गूँथ कर माला बनाया जाता है, इस माले का उपयोग मंत्र  जाप में करते हैं ।
    3. मरणासन्न व्यक्ति को तुलसी पत्ती जल में मिला कर पिलाया जाता है ।
    4. दाह संस्कार में तुलसी के तनों का प्रयोग किया जाता है ।
    5. भारतीय संस्कृति में तुलसी विहन घर को पवित्र नहीं माना जाता ।

     रासायनिक संगठन-

    तुलसी में अनेक जैव सक्रिय रसायन पाए गए हैं, जिनमें ट्रैनिन, सैवोनिन, ग्लाइकोसाइड और एल्केलाइड्स प्रमुख हैं। तुलसी में उड़नशिल तेल पाया जाता है । जिसका औषधिय उपयोग होता है ।  कुछ समय रखे रहने पर यह स्फिटिक की तरह जम जाता है । इसे तुलसी कपूर भी कहते हैं ।  इसमें कीनोल तथा एल्केलाइड भी पाये जाते हैं ।  एस्कार्बिक एसिड़ और केरोटिन भी पाया जाता है ।


    व्यवसायिक खेती-

    तुलसी अत्यधिक औषधीय उपयोग का पौधा है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसका उपयोग तो होता ही रहा है वर्तमान में इससे अनेकों खाँसी की दवाएँ साबुन, हेयर शैम्पू आदि बनाए जाने लगे हैं। जिससे तुलसी के उत्पाद की मांग काफी बढ़ गई है। अतः मांग की पूर्ति बिना खेती के संभव नहीं हैं।
    इसकी खेती, कम उपजाऊ जमीन में भी की जा सकती है । इसके लिये बलूई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती हैं। इसके लिए उष्ण कटिबंध एवं कटिबंधीय दोनों तरह जलवायु उपयुक्त होती है।
    इसकी खेती रोपाई विधि से करना चाहिये । बादल या हल्की वर्षा वाले दिन इसकी रोपाई के लिए बहुत उपयुक्त होते हैं। रोपाई के बाद खेत को सिंचाई तुरंत कर देनी चाहिए।
    रोपाई के 10-12 सप्ताह के बाद यह कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके फसल की औसत पैदावार 20 - 25 टन प्रति हेक्टेयर तथा तेल का पैदावार 80-100 किग्रा. हेक्टेयर तक होता है।

    तुलसी के महत्वपूर्ण औषधीय उपयोग-

    1. वजन कम करने में- तुलसी की पत्तियों को दही या छाछ के साथ सेवन करने से वजन कम होता होता है ।  शरीर की चर्बी कम होती है । शरीर सुड़ौल बनता है ।

    2. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में - प्रतिदिन तुलसी के 4-5 ताजे पत्ते के सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होता है ।

    3. तनाव दूर करने में -तुलसी के नियमित उपयोग से इसमें एंटीआक्तिडेंट गुण पाये जाने के कारण यह कार्टिसोल हार्मोन को संतुलित करती है, जिससे तनाव दूर होता है ।

    4. ज्वर में- तुलसी की पत्ती और काली मिर्च का काढ़ा पीने से ज्वर का शमन होता है ।

    5. मुँहासे में- तुलसी एवं नीबू के रस बराबर मात्रा में लेकर मुँहासे में लगाने पर लाभ होता है ।

    6. खाज-खुजली में- तुलसी की पत्ति एवं नीम की पत्ति बराबर मात्रा में लेप बनाकर लगाने पर लाभ होता है ।  साथ ही बराबर मात्रा में तुलसी पत्ति एवं नीम पत्ति चबाने पर षीघ्रता से लाभ होता है ।

    7. पौरूष शक्ति बढ़ाने में- तुलसी के बीज अथवा जड़ के 3 मि.ग्रा. चूर्ण को पुराने गुड़ के साथ प्रतिदिन गाय के दूध के साथ लेने पर पौरूष शक्ति में वृद्धि होता है ।

    8. स्वप्न दोष में-तुलसी बीज का चूर्ण पानी के साथ खाने पर स्वप्न दोष ठीक होता है ।

    9. मूत्र रोग में- 250 मिली पानी, 250 मिली दूध में 20 मिली तुलसी पत्ति का रस मिलाकर पीने से मूत्र दाह में लाभ होता है ।

    10. अनियमित पीरियड्स की समस्या में-तुलसी के बीज अथवा पत्ति के नियमित सेवन से महिलाओं को पीरियड्स में अनियमितता से छूटकारा मिलता है ।

    11. रक्त प्रदर में-तुलसी बीज के चूर्ण को अषोक पत्ति के रस के साथ सेवन करने से रक्त प्रदर में लाभ होता है ।

    12. अपच में- तुलसी मंजरी और काला नमक मिलाकर खाने पर अजीर्ण रोग में लाभ होता है ।

    13. केश रोग में-तुलसी पत्ति, भृंगराज पत्र एवं आवला को समान रूप  में लेकर लेपबना कर बालों में लगाने पर बालों का झड़ना बंद हो जाता है । बाल काले हो जाते हैं ।

    14. दस्त होने पर- तुलसी के पत्तों को जीरे के साथ मिलाकर पीस कर दिन में 3-4 बार सेवन करने दस्त में लाभ होता है ।

    15. चोट लग जाने पर- तुलसी के पत्ते को फिटकरी के साथ मिलाकर लगाने से घाव जल्दी ठीक हो जाता है ।

    16. शुगर नियंत्रण में- तुलसी पत्ती के नियमित सेवन से शुगर नियंत्रित होता है । तुलसी में फ्लेवोनोइड्स, ट्राइटरपेन व सैपोनिन जैसे कई फाइटोकेमिकल्स होते हैं, जो हाइपोग्लाइसेमिक के तौर पर काम करते हैं। इससे शुगर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है ।

    17. हृदय रोग में- तुलसी की पत्तियां खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करके अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाती हैं इसमें विटामिन-सी व एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो ह्रदय को फ्री रेडिकल्स से बचाकर रखते हैं।

    18. किडनी रोग में- तुलसी यूरिक एसिड को कम करती है, और इसमें मूत्रवर्धक गुण पाये जातें हैं जिससे किडनी की कार्यक्षमता में भी वृद्धि होती है ।

    19. सिर दर्द में- सिर दर्द होने पर तुलसी पत्ति के चाय पीने से लाभ होता है ।

    20. डैंड्रफ में- तुलसी तेल की कुछ बूँदे अपने हेयर आयल मिला कर लगाने से डैंड्रफ से मुक्ति मिलती है ।


    तुलसी प्रयोग की सीमाएं-

    आयुर्वेद कहता है कि हर चीज का सेवन सेहत व परिस्थितियों के अनुसार और सीमित मात्रा में ही करना चाहिए, तभी उसका फायदा होता है। इस लिहाज से तुलसी की भी कुछ सीमाएं हैं । गर्भवती महिला, स्तनपान कराने वाली महिला, निम्न रक्तचाप वाले व्यक्तियों को तुलसी के सेवन से परहेज करना चाहिये ।

    इसप्रकार तुलसी का महत्व स्पष्ट हो जाता है । इसकी महत्ता न सिर्फ धार्मिक आधार पर है, बल्कि वैज्ञानिक मापदंडों पर भी इसके चिकित्सीय लाभों को प्रमाणित किया जा रहा है। इसलिये अपने घर-आँगन में में कम से कम एक तुलसी का पौधा जरूर लगा कर रखें और उसका नियमित सेवन करें ।

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    मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

    भोजन विज्ञान

    आरोग्य और आहार विज्ञान


    नीरोग उन्हीं मनुष्यों को कहा जा सकता जिनके शुद्ध शरीर में शुद्ध मन का वास होता है । मनुष्य केवल शरीर ही तो नहीं है ।  शरीर तो उसके रहने की जगह है । शरीर, मन और इंद्रियों का ऐसा घना संबंध है कि इनमें किसी एक के बिगड़ने पर बाकी के बिगड़ने  में जरा भी देर नहीं लगती ।

    जीव मात्र देहधारी है और सबके शरीर की आकृति प्रकृति लगभग एक सी होती है । सुनने, देखने, सूँघने और भोग भोगने के लिये सभी साधन संपन्न है ।  अंतर है तो केवल मन का मनुष्य ही एक मात्रा ऐसा प्राणी है जिसमें चिंतन होता है । इसलिये आरोग्यता का संबंध तन एवं मन दोनों से है ।

    रोगों की उपचार की अपेक्षा रोगों से बचना अधिक श्रेयस्कर है । आयुर्वेदीय साहित्य में शरीर एवं व्याधि दोनों को आहारसम्भव माना गया है-‘‘अहारसम्भवं वस्तु रोगाश्चाहारसम्भवः’’ अर्थात शरीर के उचित पोषण एवं रोगानिवारणार्थ सम्यक आहार-विहार (डाइट प्लान) का होना आवश्यक है ।  भोजन निवारणात्मक और उपचारात्मक स्वास्थ्य देखरेख प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण और अविभाज्य भाग है। यदि हम प्रयत्न करें और स्वास्थ्य संबंधी आहार विज्ञान की अवधारणा को समझे ंतो अनेक रोगों से बचकर प्रायः जीवनपर्यन्त स्वस्थ रह सकते हैं । 

    आहार विज्ञान क्या है ?

    आहार विज्ञान, विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत भोजन मानव स्वास्थय को कैसे प्रभावित किया जाता है, का अध्ययन किया जाता है । आहार विज्ञान के अंतर्गत सार्वजनिक स्वास्थ्य और  उचित आहार के साथ-साथ पथ्य-अपथ्य पर भी ध्यान दिया जाता है ।

    आहार विज्ञान में मात्र आहार के भौतिक घटकों का ही महत्व नहीं अपितु आहार की संयोजना, विविध प्रकार के आहार-द्रव्यों का सम्मिलिन, आहारपाक या संस्कार, आहार की मात्रा एवं आहार ग्रहण विधि तथा मानसिकता सभी का महत्व होता है ।


    उचित आहार -

    अच्छे स्वास्थ्य के लिए  वैज्ञानिक रूप से सोच-विचार करके आहार करना अतिआवश्यक है । शरीर को उम्र, लिंग, वजन एवं शारीरिक कार्यक्षमता के अनुसार सभी पौष्टिक तत्वों की जरूरत होती है।

    संतुलित आहार वह होता है, जिसमें प्रचुर और उचित मात्रा में विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ शामिल होते है, जिससे संपूर्ण स्वास्थ्य, जीवन शक्ति और तंदुरूस्ती  बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त रूप से मिलते हैं तथा संपूरक पोषक तत्व कम अवधि की कमजोरी दूर करने की एक न्यून व्यवस्था है। आहार के भौतिक घटकों के साथ-साथ उसकी शुद्धता भी संतुलित आहार का आवष्यक गुणधर्म होना चाहिये जो दे हके साथ-साथ मन को भी स्वस्थ रख सके ।
    श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं कि-


    अहं वैश्वनरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम ।।


    इसका अर्थ यह है कि भगवान कृष्ण कहते हैं कि मैं स्वयं जठराग्नि रूप  में प्रत्येक जीव में बैठकर प्राण और अपान वायु की सहकारिता से चव्र्य, चोश्य लेह्य तथा पेय इन चार प्रकार के भोज्य अन्नों का भक्षण करता हूँ । इस आधार पर भोजन चार प्रकार के होते हैं । पहला चव्र्य ऐसा भोज्य पदार्थ जिसे चबा कर खाया जाता है । जैसे रोटी चावल आदि । दूसरा चोश्य- वह भोज्य पदार्थ जिसे चूशा जाता है जैसे आम, गन्ना आदि । तीसरा लेह्य - वह पदार्थ जिसे जीभ से चाटा जाता है, जैसे चटनी, षहद आदि । पेय-वह पदार्थ जिसे निगला जाता है जैसे रस, खिचड़ी आदि ।
    इसका अभिप्राय यह हुआ कि भोजन केवल उदरपूर्ति का साधन नहीं अपितु ईश्वर की पूजा भी है । पूजा को पवित्र होना चाहिये । इसलिये भोजन को भी पवित्र होना चाहिये । भोजन की पवित्रता के लिये निम्न चार बातों का ध्यान रखना चाहिये-
    1. स्थान की शुद्धता- जिस स्थान पर भोजन किया जाना है वह स्थान स्वच्छ हो ।
    2. भोजन करने वाले की शुद्धता-जो व्यक्ति भोजन करने वाला है वह तन एवं मन से स्वच्छ हो ।
    3. भोज्य पदार्थ की शुद्धता- जिस भोजन को ग्रहण किया जाना है वह भोजन षुद्ध एवं स्वच्छ हो ।
    4. पात्र की शुद्धता- जिस पात्र पर भोजन किया जाना है, वह पात्र स्वच्छ हो ।

    यह  शुद्धता डाक्टरी विज्ञान सम्मत भी है । इस संबंध में मिस हेलन ने यंत्र के द्वारा स्पष्ट प्रमाणित कर दिखाया है कि हाथ के साथ हाथ का स्पर्श होने पर भी रोग का बीज एक दूसरे में चले जाते हैं । केवल रोग ही नहीं स्पर्ष से शारीरिक और मानसिक वृत्तियों में भी हेर-फेर हो जाता है । 
    प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्लामेरियन कहते हैं-‘वह कौन शक्ति है जो हाथों की नसों के द्वारा अँगुलियों के अन्त तक चली जाती है ? इसी को वैज्ञानिकगण ‘आकाशी शक्ति’ कहते हैं । वह मस्तिष्क से प्रारंभ होती है, मनोवृत्तियों के साथ जा मिलती है और स्नायुपथ से प्रवाहित होकर हाथ, आँख और पाँव की एड़ीतक पहुँचती है ।  इन तीनों के ही द्वारा दूसरों पर यह अपना प्रभाव दिखाती है, किन्तु इसका सबसे अधिक प्रभाव हाथ की अँगुलियों द्वारा ही प्रकट होता है ।

    पथ्य एवं अपथ्य-

    किसी प्रकार का आहर ग्रहण करना चाहिये और किस प्रकार का आहार ग्रहण नहीं करना चाहिये इसका निर्धारण ही पथ्य-अपथ्य कहलाता है । आचार्य चरक के अनुसार-


    ‘पथ्यं पथोऽनपेतं यद्यच्चोक्तं मनसः प्रियम ।यच्चाप्रियमपथ्यं च नियतं तन्न लक्षयेत् ।।



    अर्थात ‘पथ के लिये जो अनपेत हो वही पथ्य है । इसके अतिरिक्त जो मन को प्रिय लगे वह पथ्य है और इसके विपरित को अपथ्य कहते हैं ।’ अनपेत का अर्थ उपकार करने वाला होता है इसलिये इसका अभिप्राय यह हुआ को जो स्वास्थ्य के लिये उपकारी हो पथ्य है एवं जो स्वास्थ्य के हानिकारक हो वह अपथ्य है ।

    आहार के संदर्भ में यह विशेष विचारणीय तथ्य है कि सर्वविधसम्पन्न आहार का पूर्ण लाभ तबतक नहीं लिया जा सकता, जबतक मानस क्रिया का उचित व्यवहार न हो, क्योंकि कुछ ऐसे मानसिक भाव यथा दुख, भय, क्रोध, चिन्ता आदि हैं जिनका आहार पर प्रभाव पड़ता है ।


    पथ्य या अपथ्य का नियमन करने वाले घटक -

    किसी भी वस्तु को हम निश्चित रूप से पथ्य अथवा अपथ्य नहीं कह सकते । मात्रा एवं समय के अनुसार कुछ पथ्य अपथ्य हो सकते हैं तो कुछ अपथ्य पथ्य हो सकते हैं । पथ्य एवं अपथ्य को निर्धारित करने वाले प्रमुख घटक इस प्रकार हैं-


    1. मात्रा- 

    भोजन न तो अधिक मात्रा में होना चाहिये न ही कम मात्रा में । पहले खाया हुआ पहले पच जाये तभी दुबारा भोजन करना चाहिये । भोजन की मात्रा अल्प अथवा अधिक होने पर वह अपथ्य है। केवल संतुलित मात्रा में भोजन ग्रहण करना ही पथ्य है ।

    2. काल- 

    भोजन में समय का बहुत अधिक महत्व होता है । सुबह, दोपहर एवं रात्रि में भोजन की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है । सुबह और रात्रि को दोपहर की तुलना में कम भोजन करना चाहिये । इसीप्रकार भोजन का संबंध ऋतुओं से भी होता है । ग्रीष्म ऋतु अथवा वर्षा ऋतु में हल्का भोजन और शीतऋतु में गरिष्ठ भोजन श्रेयस्कर होता है । समय एवं ऋतु के अनुरूप भोजन ही पथ्य है ।

    3. क्रिया-

    भोजन सुपाच्य हो इसके भोजन ग्रहण करने की विधि पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है । भोजन अच्छे से चबा-चबा कर करना, भोजन करते समय पानी न पीना, खड़े-खड़े भोजन ग्रहण करने के बजाय बैठकर भोजन करना श्रेयस्कर माना जाता है । उचित क्रिया से जो भोजन न किया जाये वह अपथ्य है ।

    4. भूमि या स्थान-

    देश के अनुसार ठंड़े या गर्म देशों में भोजन में परिवर्तन होना स्वभाविक है । इसलिये भोजन को प्रदेश के मौसम के अनुकूल होना चाहिये । भूमि अथवा प्रदेश के अनुरूप भोजन करना पथ्य है ।

    5. देह-

    प्रत्येक शरीर की पाचन शक्ति भिन्न-भिन्न होती है । अवस्था के अनुसार भोजन की आवश्यकता भी भिन्न-भिन्न होती है ।  इसी प्रकार महिलाओं एवं पुरूषों के लिये भी भिन्न-भिन्न भोजन की आवश्यकता होती है । अपने शरीर के अनुरूप ही भोजन करना ही पथ्य है ।

    6. दोष-

    भोजन ग्रहण करते समय की मनोदशा भी यह निर्धारित करता है की  ग्रहण किये जाने वाला भोजन पथ्य है अथवा नहीं । जब अच्छा महसूस नहीं हो रहा होता तो भोजन अरूचिकर लगने लगता है । बीमार होने की स्थिति में पथ्य की परिभाषा परिवर्तित हो जाती है । इस स्थिति में वही भोजन पथ्य है जो उस बीमारी को ठीक करने में उपयोगी हो ।

    प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं निर्धारित करना चाहिये कि उसके लिये उपयुक्त आहार क्या है, क्योंकि आहार का पथ्य अथवा अपथ्य होना एक तो व्यक्ति की प्रकृति पर निर्भर होता है दूसरा देश, काल, मात्रा आदि पर निर्भर करता है ।  आहार यदि जीवनीय तत्वों से भरपूर तथा उचित मात्रा में किया जाये तो शरीर में व्याधिक्षमत्व बढ़ता है ।  आचार्य चरक ने आहार ग्रहण करने के दस नियमों का नियमन किया है-
    1. ताजा भोजन ग्रहण करना चाहिये ।
    2. स्निग्ध आहार ग्रहण करना चाहिये ।
    3. नियत मात्रा में आहार लेना चाहिये ।
    4. भोजन के पूर्ण रूप से पच जाने के पश्चात ही भोजन करना चाहिये ।
    5. शक्तिवर्धक आहार लेना चाहिये ।
    6. स्थान विशेष के अनुरूप आहार लेना चाहिये ।
    7. द्रुतगति से भोजन नहीं करना चाहिये ।
    8. अधिक विलम्ब तक भोजन नहीं करना चाहिये ।
    9. शान्तिपूर्वक शांत चित्त से भोजन करना चाहिये ।

    10. अपने आत्मा का सम्यक विचार कर तथा आहार द्रव्य में मन लगाकर और स्वयं की समीक्षा करते हुये भोजन करना चाहिये ।

    इस प्रकार कह सकते हैं कि- विवेकपूर्ण-आहार से ही शांत, सुखी, स्वस्थ तथा आध्यात्मिक जीवन पूर्णरूप से व्यतित किया जा सकता है ।




    सोमवार, 2 मार्च 2020

    ‘‘छत्तीसगढ़ी ल अपन पढ़ईया चाही’’


    छत्तीसगढ़ी के व्याकरण के किताब जब हिन्दी ले पहिली के आये ह त ये हा ये बात ला प्रमाणित करे बर अपन आप मा पर्याप्त हे के छत्त्तीसगढ़ी अपन आप मा कतका सक्षम हे । कोनो भी भाखा ला एक भाशा के रूप मा तभे जाने जाही  जब ओ भाशा के बोलईया, लिखईया अउ पढईया मन के संख्या एक बरोबर होवय ।
    छत्तीसगढी़ बोलईया मन के तइहा ले के आज तक के कोनो कमी नई होय हे । आज के छत्तीसगढ़ अउ तीर-तखार के राज्य मन के लकठा के रहईया मन छत्तीसगढ़ी बोलत आवंत हें ।  छत्तीसगढ़िया मन जीये-खाय बर पूरा भारत मा फइल गे हे जेखर ले छत्तीसगढ़ी बोलईया मन घला फइल गे हे । इहां तक के कोनो-कोनो देष मा घला छत्तीसगढ़ी बोलईया होंगे हें। छत्तीसगढ़ी बोलईया मन संख्या के हिसाब ले कोनो कम नई हे । कई राज्य अउ कई देष के भाशा बोलईया मन के संख्या ले जादा छत्तीसगढ़ी बोलइयामन के हे ।
    छत्तीसगढ़ बने के बाद ले छत्तीसगढ़ी भाशा के आंदोलन तेज होय हे जेखर परिणाम छत्तीसगढ़ी के राजभाशा घोशित होना होइस । छत्तीसगढ़ी के राजभाशा घोशित होय के बाद ले छत्तीसगढ़ी भले आज तक राज-काज के भाशा होय बर संघर्श करत हे  फेर अब छत्तीसगढ़ी धीरे-धीरे व्यापार-व्यवहार के भाशा बनत जात हे । पहिली रायपुर जाके छत्तीसगढ़ी बोलन त दुकानदार मन देहाती  कहँय अब आघू ले छत्तीसगढ़ी बोलथें । बड़े-बड़े आफिस मा घला अब बिना संकोच के छत्तीसगढ़ी बोलत हें । नेता-मंत्री मन घला विधानसभा मा छत्तीसगढ़ी बोलंय के मत बोलयं जनसभा मा जरूर छत्तीसगढ़ी बोलत हें । जेन छत्तीसगढ़ी पहिली गाँव-देहात के भाखा रहिस आज षहर-पहर के घलो भाखा होत जात हे । ये प्रकार ले छत्तीसगढ़ी बोलईया मन के संख्या दिन दोगुनी रात चौगुनी होवत हे ।
    छत्तीसगढ़ी कथा कहानी मन वाचिक परंपरा ले आघू रेंगत रहिन ये बात ये बताथे के छत्तीसगढ़ी ला लिखे के कमी रहिस होही । फेर छत्तीसगढ़ी व्याकरण के लिखित होना येहूँ बात ला सि़द्ध करथे के छत्तीसगढ़ी ल घला लिखे जा सकथे ।  छत्तीसगढ़ी के पहिली कहानी ला हिन्दी के पहिली कहानी मानना अउ छत्तीसगढ़ी व्याकरण ला हिन्दी के व्याकरण ले पहिली के  मानना छत्तीसगढ़ी के लिखित रूप ला घला सबल करत हे ।  हाँ ये बात ला स्वीकार करे जा सकत हे के छत्तीसगढ़ी मा लिखईया मन के पहिली कमी रहिस होही फेर लिखईया नई रहिस हे अइसे कभू नई होय हे । छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना के षांतिपूर्ण आंदोलन जब ले चलिस तब ले छत्तीसगढ़ी लिखईया मन घला बाढ़त गेइन ।  छत्तीसगढ़ राज्य बने के बाद तो येमा बनेच इजाफा आइस ।  छत्तीसगढ़ी राजभाशा बने के बाद ले छत्तीसगढ़ी मा लिखईया मन के संख्या मा एकदम से बढ़ोत्तरी होय हे ।  जेन मनखे ला बरोबर छत्तीसगढ़ी बोले ला नई आवय, जेखर घर मा छत्तीसगढ़ी नई चलय तेनोमन अब छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार बाजे लगिन । राज्य के लगभग सबो समाचार पत्र  हा छत्तीसगढ़ी बर अलग से जगह दे लग गे हें मड़ई, चौपाल, पहट, अपन डेरा जइसे पृश्ठ मा छत्तीसगढ़ी सरलग छपत हवय । दृष्य मिडिया मा घला छत्तीसगढ़ी छपत हवय । सोषल मिडिया मा दिन-रात छत्तीसगढ़ी चलत हवय ।  नंगत ले छत्तीसगढ़ी मा लिखे किताब आवत हे । गुरतुर गोठ, ‘सुरता, साहित्य के धरोहर’ जइसे वेबसाइट घला छत्तीसगढ़ी ला लगातार छापत हवय । कोरी-खइखा छत्तीसगढ़ी ब्लॉग घला छत्तीसगढ़ी मा हवय । आज के स्थिति मा छत्तीसगढ़ी मा लिखइया मन के संख्या आन भाशा मा लिखइया मन के संख्या ले कोनो कम नई हे ।  नवा-नवा लइका मन घला अब दिन-ब-दिन छत्तीसगढ़ी लिखत हें, लिखइया जादा होय के कारण ही अब छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण के मांग चलत हे । छत्तीसगढ़ बने के बीसे साल के अंदर छत्तीसगढ़ी मा लिखे किताब के खरही गंजागे हे ।
    जब छत्तीसगढ़ बोलत हें, छत्तीसगढ़ी लिखत हें त छत्तीसगढ़ी पढ़त घला होहीं अइसे कोनो भी कहि सकत हें । फेर निखालिस छत्तीसगढ़ी बोलईयामन ला कहूँ छत्तीसगढ़ी पढ़े ला कहिके तो देख ओखर माथा चकरा जथे, अइसे नई हे के ओला पढ़े ला नई आवाय ओला पढ़े ला आथे फेर ओला छत्तीसगढ़ी बोलना अउ सुनना बने लगथे, ये पढ़ई बने नई लगय । रोज के पेपर पढ़इया मन घला पेपर के छत्तीसगढ़ी पत्ता के षीर्शक ला लेह-देह के पढ़ के आघू पलट लेथें ये प्रकार ले छत्तीसगढ़ी अपन एक बड़े वर्ग ले पाठक बर तरसत हे । येही कारण के अतकाजड़ छत्तीसगढ़ मा छत्तीसगढ़ी किताब बेचाये के एक ठन दुकान नई हे । लोगन ‘छत्तीसगढ़ ला तो पढ़ना चाहथें फेर छत्तीसगढ़ी ला पढ़ना नई चाहंय ।’  छत्तीसगढ़ी पढ़त कोन हे जेन छत्तीसगढ़ी मा लिखत हे, जेन अपन आप ला छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मानत हे या जेन साहित्यकार होना चाहत हे । येहूँ अतका आंगा-भारू हे के अपने लिखथें, अपने छपवाथें अउ अपने पढ़थें । दूसर के छपे ला या तो पढ़बे नई करंय या सरसरी निगाह ले देख के पढ़ ढरेन कहिके डकार भर लेथें ।  साहित्यकार के सोला आना मा के चउदा आना निखालिस कवि हें, किताब छपवाथें अउ एक-दूसर ला फोकट मा बांट देथे, फेर ओहूँ फोकट के किताब ला पढ़े बर कोखरो मेरा चिटुक भर बेरा नई हे ।  ये किताब मन घर के पठेरा मा धुर्रा-खात दियार ला बलावत रहि जाथें । सोषल मिडिया मा जतका वाह-वाह के ढेर लगथे ओखर आधा मनखे मन घला ओ छत्तीसगढ़ी रचना के आधा भाग ला घला पढ लेइन त बहुत हे ।
    आम छत्तीसगढ़ी भाखा के मनखे मन ला केवल ओही छत्तीसगढ़ी गीत-कविता के सुरता हे जेन ला ओमन कान ले सुने हें ।  येही कारण हे ओमन केवल ओही भर मन ला कवि मान बइठे हे जेखर मेरा बोले के सुग्घर कला हे जेखर ला ओमन मंच मा सुनत हे । ओमन ये बात ले अनजान कस लगथें के जेन मंच मा नई आवय तेनो मन कवि हे, कतको मंची कवि ले श्रेश्ठ कवि हे जेखर मूल्यांकन तभे होही जब ओला पढ़े जाही ।
    छत्तीसगढ़ी भाशा ला समृद्ध बनाये बर येखर बोलईया, सुनईया, लिखईया अउ पढ़ईया सबो के बराबर विकास होवय ।  कोनो भी साहित्य के मूल्यांकन तभे न होही जब होखर कोनो पाठक होही । पाठक सीमित होही त मूल्यांकन घला आंषिक होही । छत्तीसगढ़ी भाशा राज-काज, व्यवहार के भाशा तभे हो सकत हे जब ओखर पाठक होही ।
    छत्तीसगढ़ी मान-सम्मान बर, येखर विकास बर, छत्तीसगढ़ी पढ़ईया मन के ओतके जरूरत हे जतका कोनो धंधा-पानी के बाढ़ बर गा्रहक । जेन छत्तीसगढ़ी प्रेमी मन छत्तीसगढ़ी आंदोलन के झंड़ा बरदर हे, जेखर अंतस मा अपन भाशा बर मया हे, जेन छत्तीसगढ़ी वाचिक परंपरा ला लिखित रूप मा लाये के अदम साहस करें हें ओही मन ला अब येखर पढईया बनाये के घला उदिम करना चाही ।  छत्तीसगढ़ी लिखईया भर नही पहिली पाठक घला होना चाही । येखर सुरवात अपने आप ले करना चाही जइसे खुद ला एक छत्तीसगढ़ी लिखईया बनायें हें ओइसने पहिली अपन ला एक छत्तीसगढ़ी पढ़ईया घला बनावँय । अपन तीर-तखार के संगी मन ला छत्तीसगढ़ी पढ़े बर प्रोत्साहित करँय । जतका जोर-षोर से येखर स्कूली पाठ्यक्रम मा षामील करे के मांग करत हन ओतके येला पढ़े बर घला लोगन मा जन-जागृति लाये के जरूरत हे । जहां जनसमर्थन ऊहां सरकार ला पाछू आवब मा चिटको देरी नई लगय । आज छत्तीसगढ़ी के गोहर ला सुने के जरूरत हे के ‘मोला बोलईया-सुनईया, लिखईया के संगे-संग पढ़ईया घला चाही ।’



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