मंगलवार, 23 मई 2017

‘स्वच्छता के निहितार्थ एवं व्यवहारिक पक्ष‘‘


भारत के प्राचीन संस्कृति सदैव सामाजिक सारोकार से जुड़ी रही किन्तु आधुनिकता के अंधी दौड़ में व्यक्तिनिष्ठ जीवनषैली का विकास होने लगा सामाज के प्रति सामूहिक दायित्व क्षीण प्रतित होने लगा ।  जहां पहले सामाजिक सरोकार व्यक्ति-व्यक्ति के मनो-मस्तिश्क में था वहीं अब सामाजिक दायित्व कुछ सामाजिक संगठन  एवं राज्य तथा केन्द्र सरकार के कंधो पर प्रतित होने लगा । ‘स्वच्छता‘ एक मानसिक संस्कृति है न कि कोई प्रायोजित अभियान ।  भारत के प्राचीन ग्रामिण परिवेष का अध्ययन करें तो पता चलता है ‘स्वच्छता‘ ग्रामीण जीवन शैली का अभिन्न अंग रहा है । गांव में जीवन का शुरूवात ही सूर्योदय के साथ सफाई से हुआ करता था ।  प्रत्येक घर के महिलाएं अपने-अपने धरों के साथ-साथ गलियों की भी सफाई किया करती थीं । गोबर पानी से गलियों में छिटा देना यही वह संस्कृति है ।  अपने घर के कुड़े करकट को प्रतिदिन इक्ठठा कर गांव के बाहर घुरवा (कुड़े का गड्डा) में इकत्र कर खाद बनाया करते थे । प्रत्येक घर में यह कार्य होने से गांव की सफाई प्रतिदिन स्वभाविक रूप से हो जाया करती थी ।
खुले में शौच को कभी भी कुसंस्कृति अथवा गंदगी के कारक के रूप में नही देखा गया जैसे आज प्रचारित किया जा रहा है । इससे प्रश्न उठता है कि क्या हमारे पूर्वज इस बात से अनजान थे अथवा आज के परिस्थिति में खुले में शौच गंदगी का कारण है ? दोनों परिस्थिति पर दृष्टिपात किया जाये तो एक बात स्पष्ट होता है यह परिस्थिति जन्य है पहले प्रत्येक गांव में एकाधिक तालाब हुआ करते थे तालाब से लगे विषाल खाली भू-भाग हुआ करता था । गांव में चिन्हाकित उस स्थल पर ही गांव के लोग शौच के लिये जाया करते थे ।  गांव के पास अत्र-तत्र शौच की प्रथा नही थी । इससे गांव में गंदगी नही होता था किन्तु आज भूमि के अनाधिकृत कब्जा (बेजाकब्जा) से गांव में खुले में वह स्थान नही बच पाया जिससे गांव के समीप सड़क किनारे गलियों पर लोग शौच के लिये जाने लगे जिससे गंदगी होना स्वभाविक है ।
वर्तमान परिदृश्य से ऐसा लग रहा मानो स्वच्छता का अभिप्राय केवल शौचालय का उपयोग करना मात्र है ।  केवल खुले में शौच मुक्त गांव होने से गांव गंदगी मुक्त हो जायेगा ।  शौचलय स्वच्छता का एक अंग है न कि  एक मात्र अंग ।  आज गांव के समुचित स्वचछता पर ध्यान न देकर केवल शौचलय पर जोर देना स्वच्छता संस्कृति को पंगु कर रहा है ।  खुले में शौचमुक्त गांव-षहर बनाने के फेर में यह ध्यान नही दिया जा रहा है कि शौचालय का बनावट कैसे हो उसके ओवरफ्लो का निस्तारी कैसे हो, शौचालय प्रयोग करते समय पानी की व्यवस्था कैसे हो ? इस भीष्ण गर्मी एवं दुश्काल में पानी की व्यवस्थ कहां से हो ? इन बातों पर चिंतन किये बैगर केवल येन-केन प्रकार से शौचालय निर्माण किया जा रहा है । शौचालय निर्माण बाध्यकारी प्रतित होने पर ही ऐसे हो रहा न कि सामाजिक जाग्ररूकता के कारण ।  शौचालय निर्माण के अतिरिक्त सफाई के नाम पर कोई कार्य नही हो रहा है ।  गांव के नालियों में गंदगी अटा पड़ा है ।  लोग गलियों में कुड़े करकट आबाद गति से फेक रहे हैं, इस पर कोई अंकुष नही है । अधिकांष लोग काम चलाऊ शौचलय सड़क किनारे, गली पर ही बना रहे है जिससे उनके शौचालय से प्रवाहित पानी गली पर ही बह रहा है । शौचालय के नाम पर गलियों अतिक्रमण हो रहा है सो अलग ।
गांव-नगर की समुचित सफाई व्यवस्था की आवष्यकता है । यह उद्देष्य केवल प्रशासनिक ईकाईयों द्वारा पूरा करना तब तक संभव नही जब तक आम व्यक्ति सफाई संस्कृति को जीवन में अपनायेंगे नहीं ।  समाज में सामाजिक सरोकार से हर व्यक्ति को जुड़ने की आवष्यकता है । कई ईकाईयों द्वारा खुले में शौच पर दण्ड़ के प्रावधान किये गये है । प्रश्न उठता है अन्य गंदगी हेतु दण्ड़ की व्यवस्था क्यों नही ? उस व्यक्ति के प्रति, उस संस्थान के प्रति जो गंदगी फैला रहे हैं ।  यह भी प्रश्न उठता है उस प्रषासनिक ईकाई पर दण्ड क्यों नही जो गांव-नगर की नियमित सफाई में असफल सिद्ध हो रहे हैं ।  हर व्यक्ति, हर संस्था हर ईकाई के दायित्व निर्धारित करना होगा कि वे गंदगी न करें । तभी गंदगी दैत्य को पराजित कर पाना संभव है ।  जब तक लोगों में व्यक्तिवाद रहेगा, सामाजिक दायित्व से दूर रहेंगे तब तक यह संभव नही है । कुछ लोंगो में यह सोच विकसित हो रहा है जो भविष्य को आशान्वित करता है ।

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

‘‘गांव होवय के देश सबो के आय‘‘

‘‘गांव होवय के देश सबो के आय‘‘

मनखे जनम  जात एक ठन सामाजिक प्राणी आवय ।  ऐखर गुजारा चार झन के बीचे मा हो सकथे । अकेल्ला मा दूये परकार के मनखे रहि सकथे एक तन मन ले सच्चा तपस्वी अउ दूसर मा बइहा भूतहा जेखर मानसिक संतुलन डोल गे हे ।  सामाजिक प्राणी के सबले छोटे इकाई घर परिवार होथे, जिहां जम्मोझन जुर मिल के एक दूसर के तन मन ले संग देथें अपने स्वार्थ भर ला नई देखंय कहू कोनो एको झन अपन स्वार्थ ला, अपन अहम ला, जादा महत्व दे लगिन ता ओ परिवार के पाया ह डोले लगथें अउ ओ धसक जाथे ।   परिवार ला बचाय रखे मा छोटे ले लेके बड़े तक के सहयोग होथे ।   ओही रकम गांव अउ देश  सबो के आय ।  एक झन के बलबूता मा ना गांव बनय ना देश ।   लोकतंत्र मा देश  के राजा आम जनता हा होथे अउ नेता मन हमर चुने प्रतिनिधि ।   जइसे पहिली गौटिया मन मुकतियार राखय अउ अपन बगरे काम के जिम्मेदारी ला देवंय ओइसने नेता मन जनता के मुकतियार होथे अउ अधिकारी करमचारी मन जनता के नौकर ।  फेर एक बात देखे मा आथे के हमन सोचथन गांव अउ देश तो सरकार अउ ओखर मातहत करमचारी मन के ये हमला का करे ला हे ?   सोच के देखव भला गांव, देश  आखिर आय काखर ?  तोरे रे भई ये देश  के मालिक तही हस । ये देश हा तोर ऐ, मोर ऐ, ऐखर ऐ, ओखर ऐ अरे भई सबो के ऐ ।
ऐमा का अड़चन हे के देश  हा सबो के ऐ ता ।  जइसे अपन परिवार मा 8-10 मनखे रहिथन ता घर के खेत-खार, धन-दौलत सबो झन के आय के नही ।  जम्मा झन ऐखर देख-रेख करथन के नही ।  अपन-अपन ताकत के पूर्ति लइका अउ सियान अपन परिवार के देख-रेख करथन ।  ओइसने भइया अपन देश के अपन गांव के देख-रेख करना हे ।  वास्तव म मनखे परानी कोनो चीज ला अपन मान लेथे तभे ओखरे बर मया करथे अउ ओखर देख-रेख करथे जइसे कोनो किसनहा अपन खेत मा धसे गाय-गरूवा ला खेदथे दूसर के खेत के ला नई खेदय ।  कोनो मनखे दूसर मनखे के रिश्तेदार के मरे मा नइ रोवय अपनेच बर रोथे ।

अपन मान ले तैं कहूं, तोरे ओ हर आय ।
पर के माने तै कहूं, सबो उजड़ तो जाय ।।

ये मोहल्ला हा, ये पारा हा, ये गांव हा, ये देश हा तोरे तो आय । दिल ले मान ऐला अपन घर परिवार कस जान अउ ओइसने ऐखरो देख भाल कर ।  अपन मुह के कौरा ला लइका ल देथस नही ?  ओइसने छेके परिया ला गाय गरूवा बर छोड़, गली ला सकेले चौरा बनाय हस तेला, सबके रेंगे बर फोर ।  गांव के गली मा कचरा छन कर, छन कर तरिया नदिया के घठौंदा ला तैं गंदा, तरिया नरवा पार मा झन बना अपन बसेरा ।  गांव ला साफ सुथरा चातर रख, अपन अंगना कस । अइसन कहू हमर सबके सोच होय ता हमर गांव सुधरही, हमरदेश  सुधरही ।  ऐ एक झन के बुता नो हय सबो झन के जुरमिल के परयास करे मा ये काम सवरही काबर के गांव होवय के देश  सबो के आय ।

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

‘मुक्तक‘

‘मुक्तक‘
‘अग्निपुराण’ में मुक्तक को परिभाषित करते हुए कहा गया किः
”मुक्तकं श्लोक एवैकश्चमत्कारक्षमः सताम्”
अर्थात चमत्कार की क्षमता रखने वाले एक ही श्लोक को मुक्तक कहते हैं.
महापात्र विश्वनाथ (१३ वीं सदी) के अनुसार ’छन्दोंबद्धमयं पद्यं तें मुक्तेन मुक्तकं’  अर्थात जब एक पद अन्य पदों से मुक्त हो तब उसे मुक्तक कहते हैं. मुक्तक का शब्दार्थ ही है ’अन्यैः मुक्तमं इति मुक्तकं’ अर्थात जो अन्य श्लोकों या अंशों से मुक्त या स्वतंत्र हो उसे मुक्तक कहते हैं. अन्य छन्दों, पदों ये प्रसंगों के परस्पर निरपेक्ष होने के साथ-साथ जिस काव्यांश को पढने से पाठक के अंतःकरण में रस-सलिला प्रवाहित हो वही मुक्तक है- ’मुक्त्मन्यें नालिंगितम.... पूर्वापरनिरपेक्षाणि हि येन रसचर्वणा क्रियते तदैव मुक्तकं’
’मुक्तक’ वह स्वच्छंद रचना है जिसके रस का उद्रेक करने के लिए अनुबंध की आवश्यकता नहीं। वास्तव में मुक्तक काव्य का महत्त्वपूर्ण रूप है, जिसमें काव्यकार प्रत्येक छंद में ऐसे स्वतंत्र भावों की सृष्टि करता है, जो अपने आप में पूर्ण होते हैं। मुक्तक काव्य या कविता का वह प्रकार है जिसमें प्रबन्धकीयता न हो। इसमें एक छन्द में कथित बात का दूसरे छन्द में कही गयी बात से कोई सम्बन्ध या तारतम्य होना आवश्यक नहीं है। कबीर एवं रहीम के दोहे; मीराबाई के पद्य आदि सब मुक्तक रचनाएं हैं। हिन्दी के रीतिकाल में अधिकांश मुक्तक काव्यों की रचना हुई। इस परिभषा के अनुसार प्रबंध काव्यों से इतर प्रायः सभी रचनाएँ “मुक्तक“ के अंतर्गत आ जाती है !
आधुनिक युग में हिन्दी के आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसारः -‘मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है ।
लोक प्रचलित मुक्तक-लोकप्रचलित मुक्तक का संबंध उर्दू साहित्य से है । गजला के मतला के साथ मतलासानी चिपका हुआ हो तो इसे मुक्तक कहते हैं । मुक्तक एक सामान मात्राभार और समान लय (या समान बहर) वाले चार पदों की रचना है जिसका पहला , दूसरा और चौथा पद तुकान्त तथा तीसरा पद अतुकान्त होता है और जिसकी अभिव्यक्ति का केंद्र अंतिम दो पंक्तियों में होता है !
समग्रतः मुक्तक के लक्षण निम्न प्रकार हैं -
१. इसमें चार पद होते हैं
२. चारों पदों के मात्राभार और लय (या बहर) समान होते हैं
३. पहला , दूसरा और चौथा पद में रदिफ काफिया अर्थात समतुकान्तता होता हैं जबकि तीसरा पद अनिवार्य रूप से अतुकान्त होता है ।
४. कथ्य कुछ इस प्रकार होता है कि उसका केंद्र विन्दु अंतिम दो पंक्तियों में रहता है , जिनके पूर्ण होते ही पाठक/श्रोता ’वाह’ करने पर बाध्य हो जाता है !
५. मुक्तक की कहन कुछ-कुछ  ग़ज़ल के शेर जैसी होती है , इसे वक्रोक्ति , व्यंग्य या अंदाज़-ए-बयाँ के रूप में देख सकते हैं !
जैसे-
आज अवसर है दृग मिला लेंगे. 212 222 1222
प्यार को अपने आजमा लेंगे. 212 222 1222
कोरा कुरता है आज अपना भी
कोरी चूनर पे रंग डालेंगे.
-श्री चन्द्रसेन ’विराट’
किसी पत्थर में मूरत है कोई पत्थर की मूरत है 1222 1222 1222 1222
लो हमने देख ली दुनिया जो इतनी ख़ूबसूरत है   1222 1222 1222 1222
ज़माना अपनी समझे पर मुझे अपनी खबर ये है   1222 1222 1222 1222
तुम्हें मेरी जरूरत है मुझे तेरी जरूरत है     1222 1222 1222 1222
-कुमार विश्वास मुफाईलुन

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है, 1222 1222 1222 1222
मगर धरती की बेचैनी को, बस बादल समझता है 1222 1222 1222 1222
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ तू मुझसे दूर कैसी है 1222 1222 1222 1222
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है.’ 1222 1222 1222 1222
-कुमार विश्वास
भाव थे जो शक्ति-साधन के लिए, 2122 2122 212 फाइलातुन फाइलुन
लुट गये किस आंदोलन के लिए ?
यह सलामी दोस्तों को है, मगर
मुट्ठियाँ तनती हैं दुश्मन के लिए !
-षमषेर बहादुर सिंह
रदीफ
रदीफ़ अरबी शब्द है इसकी उत्पत्ति “रद्” धातु से मानी गयी हैद्य रदीफ का शाब्दिक अर्थ है ’“पीछे चलाने वाला’” या ’“पीछे बैठा हुआ’” या ’दूल्हे के साथ घोड़े पर पीछे बैठा छोटा लड़का’ (बल्हा)। ग़ज़ल के सन्दर्भ में रदीफ़ उस शब्द या शब्द समूह को कहते हैं जो मतला (पहला शेर) के मिसरा ए उला (पहली पंक्ति) और मिसरा ए सानी (दूसरी पंक्ति) दोनों के अंत में आता है और हू-ब-हू एक ही होता है यह अन्य शेर के मिसरा-ए-सानी (द्वितीय पंक्ति) के सबसे अंत में हू-ब-हू आता है ।
उदाहरण -
हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
- (दुष्यंत कुमार)
मुक्तक के प्रथम, द्वितीय एवं चतुर्थ पंक्ति के अंत के षब्द या षब्दांष एक ही होना चाहिये । अर्थात इन तीनों पंक्ति में रदिफ एक समान हो किन्तु तीसरी पंक्ति रदिफ मुक्त हो ।
जैसे-
आँसुओं का समंदर सुखाया गया ,
अन्त में बूँद भर ही बचाया गया ,
बूँद वह गुनगुनाने लगी ताल पर -
तो उसे गीत में ला छुपाया गया !
................. ओम नीरव.

काफिया
अरबी शब्द है जिसकी उत्पत्ति “कफु” धातु से मानी जाती है । काफिया का शाब्दिक अर्थ है ’जाने के लिए तैयार’ ।  ग़ज़ल के सन्दर्भ में काफिया वह शब्द है जो समतुकांतता के साथ हर शेर में बदलता रहता है यह ग़ज़ल के हर शेर में रदीफ के ठीक पहले स्थित होता है  जबकि मुक्तक पहले, दूसरे एवं चौथे पंक्ति में ।
उदाहरण -
         हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
         इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
         मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
         हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए दृ (दुष्यंत कुमार)

आँसुओं का समंदर सुखाया गया ,
अन्त में बूँद भर ही बचाया गया ,
बूँद वह गुनगुनाने लगी ताल पर -
तो उसे गीत में ला छुपाया गया !
................. ओम नीरव.
रदीफ से परिचय हो जाने के बाद हमें पता है कि प्रस्तुत अशआर में चाहिए हर्फ़-ए-रदीफ है इस ग़ज़ल में “पिघलनी”, “निकलनी”, “जलनी” शब्द हर्फ -ए- रदीफ ‘चाहिए’ के ठीक पहले आये हैं और समतुकांत हैं

बहर- मात्राओं के क्रम को ही बहर कहा जाता है ।  जिस प्रकार हिन्दी में गण होता है उसी प्रकार उर्दू में रूकन होता है ।
रुक्न = गण, घटक, पद, निश्चित मात्राओं का पुंज । जैसे हिंदी छंद शास्त्र में गण होते हैं, यगण (२२२), तगण (२२१) आदि उस तरह ही उर्दू छन्द शास्त्र ’अरूज़’ में कुछ घटक होते हैं जो ’रुक्न’ कहलाते हैं ।
बहुवचन=अरकान

रुक्न के दो भेद होते हैं -
१ - सालिम रुक्न (मूल रुक्न)
२- मुज़ाहिफ रुक्न (उप रुक्न)

१) सालिम रुक्न (मूल रुक्न) - अरूज़शास्त्र में सालिम अरकान की संख्या सात कही गई है

रुक्न          -   रुक्न का नाम       -  मात्रा
फ़ईलुन         -     मुतक़ारिब       -  १२२
फ़ाइलुन         -   मुतदारिक        -  २१२
मुफ़ाईलुन      -  हजज़                -  १२२२
फ़ाइलातुन      -  रमल                -  २१२२
मुस्तफ़्यलुन   -  रजज़                -  २२१२
मुतफ़ाइलुन    -  कामिल              -  ११२१२
मफ़ाइलतुन    -  वाफ़िर               -  १२११२

२) मुज़ाहिफ रुक्न (उप रुक्न)- सात मूल रुक्न के कुछ उप रुक्न भी हैं जो मूल रुक्न को तोड़ कर अथवा मात्रा जोड़ कर बनाए गये हैं
उदाहरण - २(फ़ा), २१( फ़ेल), १२(फ़अल), १२१ (फ़ऊल), ११२ (फ़इलुन), २१२(फ़ाइलुन), ११२२(फ़इलातुन), १२१२(मुफ़ाइलुन), २१२२१(फाइलातान)आदि

(किसी रुक्न से उप रुक्न बनाने का नियम तथा संख्या निश्चित है जैसे - रमल(२१२२) मूल रुक्न के ११$१७ प्रकार का वर्णन मिलाता है तथा सभी का एक निश्चित नाम है )
बहर के निर्माण में इन उप रुक्न की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है

सभी ग़ज़ल इन सात सालिम व मुजाहिफ अर्कान के अनुसार ही लिखी/कही जाती है

बहर का नाम लिखते समय हम इन बातों का ध्यान देते हैं -

बहर के रुक्न का नाम $ रुक्न की संख्या का नाम $ रुक्न सालिम हैं तो ’सालिम’ लिख्नेगे अथवा अर्कान में मुजाहिफ रुक्न का इस्तेमाल भी हुआ है तो मुजाहिफ रुक्न के प्रकार का उल्लेख करेंगे

 अतः २१ मुफरद सालिम बहर की सूचि तथा उनके नाम इस प्रकार है

मुतकारिब
१२२ १२२ १२२ १२२ - मुतकारिब मुसम्मन सालिम
१२२ १२२ १२२ - मुतकारिब मुसद्दस सालिम
१२२ १२२ - मुतकारिब मुरब्बा सालिम
 मुतदारिक
२१२ २१२ २१२ २१२ - मुतदारिक मुसम्मन सालिम
२१२ २१२ २१२ - मुतदारिक मुसद्दस सालिम
२१२ २१२ मुतदारिक मुरब्बा सालिम
 रमल
२१२२ २१२२ २१२२ २१२२ - रमल मुसम्मन सालिम
२१२२ २१२२ २१२२ - रमल मुसद्दस सालिम
२१२२ २१२२ - रमल मुरब्बा सालिम
 हजज
१२२२ १२२२ १२२२ १२२२ - हजज मुसम्मन सालिम
१२२२ १२२२ १२२२ - हजज मुसद्दस सालिम
१२२२ १२२२ - हजज मुरब्बा सालिम
 रजज
२२१२ २२१२ २२१२ २२१२ - रजज मुसम्मन सालिम
२२१२ २२१२ २२१२ - रजज मुसद्दस सालिम
२२१२ २२१२ - रजज मुरब्बा सालिम
 कामिल
११२१२ ११२१२ ११२१२ ११२१२ - कामिल मुसम्मन सालिम
११२१२ ११२१२ ११२१२ - कामिल मुसद्दस सालिम
११२१२ ११२१२ - कामिल मुरब्बा सालिम
 वाफिर
१२११२ १२११२ १२११२ १२११२ - वाफिर मुसम्मन सालिम
१२११२ १२११२ १२११२ - वाफिर मुसद्दस सालिम
१२११२ १२११२ - वाफिर मुरब्बा सालिम

प्रत्येक मुफरद सालिम बह््रों से कुछ उप-बहरों का निर्माण होता हैद्य उप-बहर बनाने के लिए मूल बहर में एक या एक से अधिक सालिम रुक्न की मात्रा को घटा कर अथवा हटा कर उप-बहर का निर्माण करते हैं द्य इस प्रकार बनी बहर को ’मुफरद मुजाहिफ’ बहर कहते हैंद्य
मात्रा गणना का सामान्य नियम

बा-बह््र ग़ज़ल लिखने के लिए तक्तीअ (मात्रा गणना) ही एक मात्र अचूक उपाय है, यदि शेर की तक्तीअ (मात्रा गणना) करनी आ गई तो देर सबेर बह््र में लिखना भी आ जाएगा क्योकि जब किसी शायर को पता हो कि मेरा लिखा शेर बेबह््र है तभी उसे सही करने का प्रयास करेगा और तब तक करेगा जब तक वह शेर बाबह््र न हो जाए
मात्राओं को गिनने का सही नियम न पता होने के कारण ग़ज़लकार अक्सर बह््र निकालने में या तक्तीअ करने में दिक्कत महसूस करते हैं आईये तक्तीअ प्रणाली को समझते हैं
ग़ज़ल में सबसे छोटी इकाई ’मात्रा’ होती है और हम भी तक्तीअ प्रणाली को समझने के लिए सबसे पहले मात्रा से परिचित होंगे -

मात्रा दो प्रकार की होती है
१- ‘एक मात्रिक’ इसे हम एक अक्षरीय व एक हर्फी व लघु व लाम भी कहते हैं और १ से अथवा हिन्दी कवि द्य से भी दर्शाते हैं  
२= ‘दो मात्रिक’ इसे हम दो अक्षरीय व दो हरूफी व दीर्घ व गाफ भी कहते हैं और २ अथवौ अथवा हिन्दी कवि ै से भी दर्शाते हैं

एक मात्रिक स्वर अथवा व्यंजन के उच्चारण में जितना वक्त और बल लगता है दो मात्रिक के उच्चारण में उसका दोगुना वक्त और बल लगता है

ग़ज़ल में मात्रा गणना का एक स्पष्ट, सरल और सीधा नियम है कि इसमें शब्दों को जैसा बोला जाता है (शुद्ध उच्चारण)  मात्रा भी उस हिसाब से ही गिनाते हैं
जैसे - हिन्दी में कमल = क/म/ल = १११ होता है मगर ग़ज़ल विधा में इस तरह मात्रा गणना नहीं करते बल्कि उच्चारण के अनुसार गणना करते हैं द्य उच्चारण करते समय हम “क“ उच्चारण के बाद “मल“ बोलते हैं इसलिए ग़ज़ल में ‘कमल’ = १२ होता है यहाँ पर ध्यान देने की बात यह है कि “कमल” का ‘“मल’” शाश्वत दीर्घ है अर्थात जरूरत के अनुसार गज़ल में ‘कमल’ शब्द की मात्रा को १११ नहीं माना जा सकता यह हमेशा १२ ही रहेगा

‘उधर’- उच्च्चरण के अनुसार उधर बोलते समय पहले “उ“ बोलते हैं फिर “धर“ बोलने से पहले पल भर रुकते हैं और फिर ’धर’ कहते हैं इसलिए इसकी मात्रा गिनाते समय भी ऐसे ही गिनेंगे
अर्थात दृ उ$धर = उ १ धर २ = १२

मात्रा गणना करते समय ध्यान रखे कि -

क्रमांक १ - सभी व्यंजन (बिना स्वर के) एक मात्रिक होते हैं
जैसे दृ क, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ, ट ... आदि १ मात्रिक हैं

क्रमांक २ - अ, इ, उ स्वर व अनुस्वर चन्द्रबिंदी तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन एक मात्रिक होते हैं
जैसे = अ, इ, उ, कि, सि, पु, सु हँ  आदि एक मात्रिक हैं
क्रमांक ३ - आ, ई, ऊ ए ऐ ओ औ अं स्वर तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन दो मात्रिक होते हैं
जैसे = आ, सो, पा, जू, सी, ने, पै, सौ, सं आदि २ मात्रिक हैं

क्रमांक ४. (१) - यदि किसी शब्द में दो ’एक मात्रिक’ व्यंजन हैं तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक अर्थात दीर्घ बन जाते हैं जैसे ह१$म१ = हम = २  ऐसे दो मात्रिक शाश्वत दीर्घ होते हैं जिनको जरूरत के अनुसार ११ अथवा १ नहीं किया जा सकता है
जैसे दृ सम, दम, चल, घर, पल, कल आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं

४. (२) परन्तु जिस शब्द के उच्चारण में दोनो अक्षर अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ दोनों लघु हमेशा अलग अलग अर्थात ११ गिना जायेगा
जैसे दृ  असमय = अ/स/मय =  अ१ स१ मय२ = ११२    
असमय का उच्चारण करते समय ’अ’ उच्चारण के बाद रुकते हैं और ’स’ अलग अलग बोलते हैं और ’मय’ का उच्चारण एक साथ करते हैं इसलिए ’अ’ और ’स’ को दीर्घ नहीं किया जा सकता है और मय मिल कर दीर्घ हो जा रहे हैं इसलिए असमय का वज्न अ१ स१ मय२ = ११२  होगा इसे २२ नहीं किया जा सकता है क्योकि यदि इसे २२ किया गया तो उच्चारण अस्मय हो जायेगा और शब्द उच्चारण दोषपूर्ण हो जायेगाद्य  
 
क्रमांक ५ (१) दृ जब क्रमांक २ अनुसार किसी लघु मात्रिक के पहले या बाद में कोई शुद्ध व्यंजन(१ मात्रिक क्रमांक १ के अनुसार) हो तो उच्चारण अनुसार दोनों लघु मिल कर शाश्वत दो मात्रिक हो जाता है

उदाहरण दृ “तुम” शब्द में “’त’” ’“उ’” के साथ जुड कर ’“तु’” होता है(क्रमांक २ अनुसार), “तु” एक मात्रिक है और “तुम” शब्द में “म” भी एक मात्रिक है (क्रमांक १ के अनुसार)  और बोलते समय “तु$म” को एक साथ बोलते हैं तो ये दोनों जुड कर शाश्वत दीर्घ बन जाते हैं इसे ११ नहीं गिना जा सकता
इसके और उदाहरण देखें = यदि, कपि, कुछ, रुक आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं
 
५ (१) परन्तु जहाँ किसी शब्द के उच्चारण में दोनो हर्फ़ अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ अलग अलग ही अर्थात ११ गिना जायेगा
जैसे दृ  सुमधुर = सु/ म /धुर = स$उ१ म१ धुर२ = ११२  


क्रमांक ६ (१) - यदि किसी शब्द में अगल बगल के दोनो व्यंजन किन्हीं स्वर के साथ जुड कर लघु ही रहते हैं (क्रमांक २ अनुसार) तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक हो जाता है इसे ११ नहीं गिना जा सकता
जैसे = पुरु = प$उ / र$उ = पुरु = २,  
इसके और उदाहरण देखें = गिरि
६ (२) परन्तु जहाँ किसी शब्द के उच्चारण में दो हर्फ़ अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ अलग अलग ही गिना जायेगा
जैसे दृ  सुविचार = सु/ वि / चा / र = स$उ१ व$इ१ चा२ र१ = ११२१


क्रमांक ७ (१) - ग़ज़ल के मात्रा गणना में अर्ध व्यंजन को १ मात्रा माना गया है तथा यदि शब्द में उच्चारण अनुसार पहले अथवा बाद के व्यंजन के साथ जुड जाता है और जिससे जुड़ता है वो व्यंजन यदि १ मात्रिक है तो वह २ मात्रिक हो जाता है और यदि दो मात्रिक है तो जुडने के बाद भी २ मात्रिक ही रहता है ऐसे २ मात्रिक को ११ नहीं गिना जा सकता है
उदाहरण -
सच्चा = स१$च्१ / च१$आ१  = सच् २ चा २ = २२
(अतः सच्चा को ११२ नहीं गिना जा सकता है)
आनन्द = आ / न$न् / द = आ२ नन्२ द१ = २२१  
कार्य = का$र् / य = र्का २  य १ = २१  (कार्य में का पहले से दो मात्रिक है तथा आधा र के जुडने पर भी दो मात्रिक ही रहता है)
तुम्हारा = तु/ म्हा/ रा = तु१ म्हा२ रा२ = १२२
तुम्हें = तु / म्हें = तु१ म्हें२ = १२
उन्हें = उ / न्हें = उ१ न्हें२ = १२

७ (२) अपवाद स्वरूप अर्ध व्यंजन के इस नियम में अर्ध स व्यंजन के साथ एक अपवाद यह है कि यदि अर्ध स के पहले या बाद में कोई एक मात्रिक अक्षर होता है तब तो यह उच्चारण के अनुसार बगल के शब्द के साथ जुड जाता है परन्तु यदि अर्ध स के दोनों ओर पहले से दीर्घ मात्रिक अक्षर होते हैं तो कुछ शब्दों में अर्ध स को स्वतंत्र एक मात्रिक भी माना लिया जाता है
जैसे = रस्ता = र$स् / ता २२ होता है मगर रास्ता = रा/स्/ता = २१२ होता है
दोस्त = दो$स् /त= २१ होता है मगर दोस्ती = दो/स्/ती = २१२ होता है
इस प्रकार और शब्द देखें
बस्ती, सस्ती, मस्ती, बस्ता, सस्ता = २२
दोस्तों = २१२
मस्ताना = २२२
मुस्कान = २२१      
संस्कार= २१२१    

क्रमांक ८. (१) - संयुक्ताक्षर जैसे = क्ष, त्र, ज्ञ द्ध द्व आदि दो व्यंजन के योग से बने होने के कारण दीर्घ मात्रिक हैं परन्तु मात्र गणना में खुद लघु हो कर अपने पहले के लघु व्यंजन को दीर्घ कर देते है अथवा पहले का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी स्वयं लघु हो जाते हैं  
उदाहरण = पत्र= २१, वक्र = २१, यक्ष = २१, कक्ष - २१, यज्ञ = २१, शुद्ध =२१ क्रुद्ध =२१
गोत्र = २१, मूत्र = २१,

८. (२) यदि संयुक्ताक्षर से शब्द प्रारंभ हो तो संयुक्ताक्षर लघु हो जाते हैं
उदाहरण = त्रिशूल = १२१, क्रमांक = १२१, क्षितिज = १२

८. (३) संयुक्ताक्षर जब दीर्घ स्वर युक्त होते हैं तो अपने पहले के व्यंजन को दीर्घ करते हुए स्वयं भी दीर्घ रहते हैं अथवा पहले का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी दीर्घ स्वर युक्त संयुक्ताक्षर दीर्घ मात्रिक गिने जाते हैं
उदाहरण =
प्रज्ञा = २२  राजाज्ञा = २२२,

८ (४) उच्चारण अनुसार मात्रा गणना के कारण कुछ शब्द इस नियम के अपवाद भी है -
उदाहरण = अनुक्रमांक = अनु/क्र/मां/क = २१२१ (’नु’ अक्षर लघु होते हुए भी ’क्र’ के योग से दीर्घ नहीं हुआ और उच्चारण अनुसार अ के साथ जुड कर दीर्घ हो गया और क्र लघु हो गया)      

क्रमांक ९ - विसर्ग युक्त व्यंजन दीर्ध मात्रिक होते हैं ऐसे व्यंजन को १ मात्रिक नहीं गिना जा सकता
उदाहरण = दुःख = २१ होता है इसे दीर्घ (२) नहीं गिन सकते यदि हमें २ मात्रा में इसका प्रयोग करना है तो इसके तद्भव रूप में ’दुख’ लिखना चाहिए इस प्रकार यह दीर्घ मात्रिक हो जायेगा
मात्रा गणना के लिए अन्य शब्द देखें -
तिरंगा = ति $ रं $ गा =  ति १ रं २ गा २ = १२२    
उधर = उ/धर उ१ धर२ = १२
ऊपर = ऊ/पर = ऊ २ पर २ = २२    

इस तरह अन्य शब्द की मात्राओं पर ध्यान दें =
मारा = मा / रा  = मा २ रा २ = २२
मरा  = म / रा  = म १ रा २ = १२
मर = मर २ = २
सत्य = सत् / य = सत् २ य २ = २१

मात्रा गिराने का नियम-
वस्तुतः “मात्रा गिराने का नियम“ कहना गलत है क्योकि मात्रा को गिराना अरूज़ शास्त्र में “नियम“ के अंतर्गत नहीं बल्कि छूट के अंतर्गत आता है द्य अरूज़ पर उर्दू लिपि में लिखी किताबों में यह ’नियम’ के अंतर्गत नहीं बल्कि छूट के अंतर्गत ही बताया जाता रहा है, परन्तु अब यह छूट इतनी अधिक ली जाती है कि नियम का स्वरूप धारण करती जा रही है इसलिए अब इसे मात्रा गिराने का नियम कहना भी गलत न होगा इसलिए आगे इसे नियम कह कर भी संबोधित किया जायेगा द्य मात्रा गिराने के नियमानुसार, उच्चारण अनुसार  तो हम एक मिसरे में अधिकाधिक मात्रा गिरा सकते हैं परन्तु उस्ताद शाइर हमेशा यह सलाह देते हैं कि ग़ज़ल में मात्रा कम से कम गिरानी चाहिए
यदि हम मात्रा गिराने के नियम की परिभाषा लिखें तो कुछ यूँ होगी -

“ जब किसी बहर के अर्कान में जिस स्थान पर लघु मात्रिक अक्षर होना चाहिए उस स्थान पर दीर्घ मात्रिक अक्षर आ जाता है तो नियमतः कुछ विशेष अक्षरों को हम दीर्घ मात्रिक होते हुए भी दीर्घ स्वर में न पढ़ कर लघु स्वर की तरह कम जोर दे कर पढते हैं और दीर्घ मात्रिक होते हुए भी लघु मात्रिक मान लेते है इसे मात्रा का गिरना कहते हैं “

अब इस परिभाषा का उदाहारण भी देख लें - २१२२ (फ़ाइलातुन) में, पहले एक दीर्घ है फिर एक लघु फिर दो दीर्घ होता है, इसके अनुसार शब्द देखें - “कौन आया“  कौ२ न१ आ२ या२
और यदि हम लिखते हैं - “कोई आया“ तो इसकी मात्रा होती है २२ २२(फैलुन फैलुन) को२ ई२ आ२ या२
परन्तु यदि हम चाहें तो “कोई आया“ को  २१२२ (फाइलातुन) अनुसार भी गिनने की छूट हैद्य देखें -
को२ ई१ आ२ या२
यहाँ ई की मात्रा २ को गिरा कर १ कर दिया गया है और पढते समय भी ई को दीर्घ स्वर अनुसार न पढ़ कर ऐसे पढेंगे कि लघु स्वर का बोध हो
अर्थात “कोई आया“(२२ २२) को यदि  २१२२ मात्रिक मानना है तो इसे “कोइ आया“ अनुसार उच्चारण अनुसार पढेंगे  

नोट - ग़ज़ल को लिपि बद्ध करते समय हमेशा शुद्ध रूप में लिखते हैं “कोई आया“ को २१२२ मात्रिक मानने पर भी केवल उच्चारण को बदेंलेंगे अर्थात पढते समय “कोइ आया“ पढेंगे परन्तु मात्रा गिराने के बाद भी “कोई आया“ ही लिखेंगे

इसलिए ऐसा कहते हैं कि, ’ग़ज़ल कही जाती हैद्य’ कहने से तात्पर्य यह है कि उच्चारण के अनुसार ही हम यह जान सकते हैं कि ग़ज़ल को किस बहर में कहा गया है यदि लिपि अनुसार मात्रा गणना करें तो कोई आया हमेशा २२२२ होता है, परन्तु यदि कोई व्यक्ति “कोई आया“ को उच्चरित करता है तो तुरंत पता चल जाता है कि पढ़ने वाले ने किस मात्रा अनुसार पढ़ा है २२२२ अनुसार अथवा २१२२ अनुसार यही हम कोई आया को २१२२ गिनने पर “कोइ आया“  लिखना शुरू कर दें तो धीरे धीरे लिपि का स्वरूप विकृत हो जायेगा और मानकता खत्म हो जायेगी इसलिए ऐसा भी नहीं किया जा सकता है
ग़ज़ल “लिखी“ जाती है ऐसा भी कह सकते हैं परन्तु ऐसा वो लोग ही कह सकते हैं जो मात्रा गिराने की छूट कदापि न लें, तभी यह हो पायेगा कि उच्चारण और लिपि में समानता होगी और जो लिखा जायेगा वही जायेगा    
आशा करता हूँ तथ्य स्पष्ट हुआ होगा

आपको एक तथ्य से परिचित होना भी रुचिकर होगा कि प्राचीन भारतीय छन्दस भाषा में लिखे गये वेद पुराण आदि ग्रंथों के श्लोक में मात्रा गिराने का स्पष्ट नियम देखने को मिलता हैद्य आज इसके विपरीत हिन्दी छन्द में मात्रा गिराना लगभग वर्जित है और अरूज में इस छूट को नियम के स्तर तक स्वीकार कर लिया गया है


मात्रा गिराने के नियम को पूरी तरह से जानने के लिए जिन बातों को जानना होगा वह हैं -

अ) किन दीर्घ मात्रिक को गिरा कर लघु मात्रिक कर सकते हैं और किन्हें नहीं ?
ब) शब्द में किन किन स्थान पर मात्रा गिरा सकते हैं और किन स्थान पर नहीं?
स) किन शब्दों की मात्रा को गिरा सकते हैं औत किन शब्दों की मात्रा को नहीं गिरा सकते ?

हम इन तीनों प्रश्नों का उत्तर क्रमानुसार खोजेंगे आगे यह पोस्ट तीन भाग अ) ब) स) द्वारा विभाजित है जिससे लेख में स्पष्ट विभाजन हो सके तथा बातें आपस में न उलझें

नोट - याद रखें “स्वर“ कहने पर “अ - अः“ स्वर का बोध होता है, व्यंजन कहने पर “क - ज्ञ“ व्यंजन का बोध होता है तथा अक्षर कहने पर “स्वर“ अथवा “व्यंजन“ अथवा “व्यंजन $ स्वर“ का बोध होता है, पढते समय यह ध्यान दें कि स्वर, व्यंजन तथा अक्षर में से क्या लिखा गया है
अ) किन दीर्घ मात्रिक को गिरा कर लघु कर सकते हैं और किन्हें नहीं ?

इस प्रश्न के साथ एक और प्रश्न उठता है हम उसे भी जोड़ कर दो प्रश्न तैयार करते हैं

१) जिस प्रकार दीर्घ मात्रिक को गिरा कर लघु कर सकते हैं क्या लघु मात्रिक को उठा कर दीर्घ कर सकते हैं ?
२) हम कौन कौन से दीर्घ मात्रिक अक्षर को लघु मात्रिक कर सकते हैं ?

पहले प्रश्न का उत्तर है - सामान्यतः नहीं, हम लघु मात्रिक को उठा कर दीर्घ मात्रिक नहीं कर सकते, यदि किसी उच्चारण के अनुसार लघु मात्रिक, दीर्घ मात्रिक हो रहा है जैसे - पत्र२१ में “प“ दीर्घ हो रहा है तो इसे मात्रा उठाना नहीं कह सकते क्योकि यहाँ उच्चारण अनुसार अनिवार्य रूप से मात्रा दीर्घ हो रही है, जबकि मात्रा गिराने में यह छूट है कि जब जरूरत हो गिरा लें और जब जरूरत हो न गिराएँ
(परन्तु ग़ज़ल की मात्रा गणना में इस बात के कई अपवाद मिलाते हैं कि लघु मात्रिक को दीर्घ मात्रिक माना जाता है इसकी चर्चा हम क्रम - ७ में करेंगे)

दूसरे प्रश्न का उत्तर अपेक्षाकृत थोडा बड़ा है और इसका उत्तर पाने के लिए पहले हमें यह याद करना चाहिए कि अक्षर कितने प्रकार से दीर्घ मात्रिक बनते हैं फिर उसमें से विभाजन करेंगे कि किस प्रकार को गिरा सकते हैं किसे नहीं

इस लेखमाला में क्रम -४ (बहर परिचय तथा मात्रा गणना) में क्रमांक १ से ९ तक लघु तथा दीर्ध मात्रिक अक्षरों को विभाजित किया गया है, यदि उस सारिणी को ले लें तो बात अधिक स्पष्ट हो जायेगीद्य क्रमांकों के अंत में मात्रा गिराने से सम्बन्धित नोट लाल रंग से लिख दिया है, देखिये  -

क्रमांक १ - सभी व्यंजन (बिना स्वर के) एक मात्रिक होते हैं
जैसे दृ क, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ, ट ... आदि १ मात्रिक हैं

यह स्वयं १ मात्रिक है

क्रमांक २ - अ, इ, उ स्वर व अनुस्वर चन्द्रबिंदी तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन एक मात्रिक होते हैं
जैसे = अ, इ, उ, कि, सि, पु, सु हँ  आदि एक मात्रिक हैं

यह स्वयं १ मात्रिक है

क्रमांक ३ - आ, ई, ऊ ए ऐ ओ औ अं स्वर तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन दो मात्रिक होते हैं
जैसे = आ, सो, पा, जू, सी, ने, पै, सौ, सं आदि २ मात्रिक हैं

इनमें से केवल आ ई ऊ ए ओ स्वर को गिरा कर १ मात्रिक कर सकते है तथा ऐसे दीर्घ मात्रिक अक्षर को गिरा कर १ मात्रिक कर सकते हैं जो “आ, ई, ऊ, ए, ओ“ स्वर के योग से दीर्घ हुआ हो अन्य स्वर को लघु नहीं गिन सकते न ही ऐसे अक्षर को लघु गिन सकते हैं जो ऐ, औ, अं के योग से दीर्घ हुए हों
उदाहरण =
मुझको २२ को मुझकु२१ कर सकते हैं
आ, ई, ऊ, ए, ओ, सा, की, हू, पे, दो आदि को दीर्घ से गिरा कर लघु कर सकते हैं परन्तु ऐ, औ, अं, पै, कौ, रं आदि को दीर्घ से लघु नहीं कर सकते हैं
स्पष्ट है कि आ, ई, ऊ, ए, ओ स्वर तथा आ, ई, ऊ, ए, ओ तथा व्यंजन के योग से बने दीर्घ अक्षर को गिरा कर लघु कर सकते हैं

क्रमांक ४.
४. (१) - यदि किसी शब्द में दो ’एक मात्रिक’ व्यंजन हैं तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक अर्थात दीर्घ बन जाते हैं जैसे ह१$म१ = हम = २  ऐसे दो मात्रिक शाश्वत दीर्घ होते हैं जिनको जरूरत के अनुसार ११ अथवा १ नहीं किया जा सकता है
जैसे दृ सम, दम, चल, घर, पल, कल आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं

ऐसे किसी दीर्घ को लघु नहीं कर सकते हैंद्य  दो व्यंजन मिल कर दीर्घ मात्रिक होते हैं तो ऐसे दो मात्रिक को गिरा कर लघु नहीं कर सकते हैं
उदहारण = कमल की मात्रा १२ है इसे क१ $ मल२ = १२ गिनेंगे तथा इसमें हम मल को गिरा कर १ नहीं कर सकते अर्थात कमाल को ११ अथवा १११ कदापि नहीं गिन सकते  

४. (२) परन्तु जिस शब्द के उच्चारण में दोनो अक्षर अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ दोनों लघु हमेशा अलग अलग अर्थात ११ गिना जायेगा
जैसे दृ  असमय = अ/स/मय =  अ१ स१ मय२ = ११२    
असमय का उच्चारण करते समय ’अ’ उच्चारण के बाद रुकते हैं और ’स’ अलग अलग बोलते हैं और ’मय’ का उच्चारण एक साथ करते हैं इसलिए ’अ’ और ’स’ को दीर्घ नहीं किया जा सकता है और मय मिल कर दीर्घ हो जा रहे हैं इसलिए असमय का वज्न अ१ स१ मय२ = ११२  होगा इसे २२ नहीं किया जा सकता है क्योकि यदि इसे २२ किया गया तो उच्चारण अस्मय हो जायेगा और शब्द उच्चारण दोषपूर्ण हो जायेगाद्य  

यहाँ उच्चारण अनुसार स्वयं लघु है अ१ स१ और मय२ को हम ४.१ अनुसार नहीं गिरा सकते    

क्रमांक ५ (१) दृ जब क्रमांक २ अनुसार किसी लघु मात्रिक के पहले या बाद में कोई शुद्ध व्यंजन(१ मात्रिक क्रमांक १ के अनुसार) हो तो उच्चारण अनुसार दोनों लघु मिल कर शाश्वत दो मात्रिक हो जाता है

उदाहरण दृ “तुम” शब्द में “’त’” ’“उ’” के साथ जुड कर ’“तु’” होता है(क्रमांक २ अनुसार), “तु” एक मात्रिक है और “तुम” शब्द में “म” भी एक मात्रिक है (क्रमांक १ के अनुसार)  और बोलते समय “तु$म” को एक साथ बोलते हैं तो ये दोनों जुड कर शाश्वत दीर्घ बन जाते हैं इसे ११ नहीं गिना जा सकता
इसके और उदाहरण देखें = यदि, कपि, कुछ, रुक आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं
 
ऐसे दो मात्रिक को नहीं गिरा कर लघु नहीं कर सकते

५ (१) परन्तु जहाँ किसी शब्द के उच्चारण में दोनो हर्फ़ अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ अलग अलग ही अर्थात ११ गिना जायेगा
जैसे दृ  सुमधुर = सु/ म /धुर = स$उ१ म१ धुर२ = ११२  

यहाँ उच्चारण अनुसार स्वयं लघु है स$उ=१ म१ और धुर२ को हम ५.१ अनुसार नहीं गिरा सकते    


क्रमांक ६ (१) - यदि किसी शब्द में अगल बगल के दोनो व्यंजन किन्हीं स्वर के साथ जुड कर लघु ही रहते हैं (क्रमांक २ अनुसार) तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक हो जाता है इसे ११ नहीं गिना जा सकता
जैसे = पुरु = प$उ / र$उ = पुरु = २,  
इसके और उदाहरण देखें = गिरि

ऐसे दो मात्रिक को गिरा कर लघु नहीं कर सकते

६ (२) परन्तु जहाँ किसी शब्द के उच्चारण में दो हर्फ़ अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ अलग अलग ही गिना जायेगा
जैसे दृ  सुविचार = सु/ वि / चा / र = स$उ१ व$इ१ चा२ र१ = ११२१

यहाँ उच्चारण अनुसार स्वयं लघु है स$उ१ व$इ१    

क्रमांक ७ (१) - ग़ज़ल के मात्रा गणना में अर्ध व्यंजन को १ मात्रा माना गया है तथा यदि शब्द में उच्चारण अनुसार पहले अथवा बाद के व्यंजन के साथ जुड जाता है और जिससे जुड़ता है वो व्यंजन यदि १ मात्रिक है तो वह २ मात्रिक हो जाता है और यदि दो मात्रिक है तो जुडने के बाद भी २ मात्रिक ही रहता है ऐसे २ मात्रिक को ११ नहीं गिना जा सकता है
उदाहरण -
सच्चा = स१$च्१ / च१$आ१  = सच् २ चा २ = २२
(अतः सच्चा को ११२ नहीं गिना जा सकता है)

आनन्द = आ / न$न् / द = आ२ नन्२ द१ = २२१  
कार्य = का$र् / य = र्का २  य १ = २१  (कार्य में का पहले से दो मात्रिक है तथा आधा र के जुडने पर भी दो मात्रिक ही रहता है)
तुम्हारा = तु/ म्हा/ रा = तु१ म्हा२ रा२ = १२२
तुम्हें = तु / म्हें = तु१ म्हें२ = १२
उन्हें = उ / न्हें = उ१ न्हें२ = १२

क्रमांक ७ (१) अनुसार दो मात्रिक को गिरा कर लघु नहीं कर सकते

७ (२) अपवाद स्वरूप अर्ध व्यंजन के इस नियम में अर्ध स व्यंजन के साथ एक अपवाद यह है कि यदि अर्ध स के पहले या बाद में कोई एक मात्रिक अक्षर होता है तब तो यह उच्चारण के अनुसार बगल के शब्द के साथ जुड जाता है परन्तु यदि अर्ध स के दोनों ओर पहले से दीर्घ मात्रिक अक्षर होते हैं तो कुछ शब्दों में अर्ध स को स्वतंत्र एक मात्रिक भी माना लिया जाता है
जैसे = रस्ता = र$स् / ता २२ होता है मगर रास्ता = रा/स्/ता = २१२ होता है
दोस्त = दो$स् /त= २१ होता है मगर दोस्ती = दो/स्/ती = २१२ होता है
इस प्रकार और शब्द देखें
बस्ती, सस्ती, मस्ती, बस्ता, सस्ता = २२
दोस्तों = २१२
मस्ताना = २२२
मुस्कान = २२१      
संस्कार= २१२१
   
क्रमांक ७ (२) अनुसार हस्व व्यंजन स्वयं लघु होता है

क्रमांक ८. (१) - संयुक्ताक्षर जैसे = क्ष, त्र, ज्ञ द्ध द्व आदि दो व्यंजन के योग से बने होने के कारण दीर्घ मात्रिक हैं परन्तु मात्र गणना में खुद लघु हो कर अपने पहले के लघु व्यंजन को दीर्घ कर देते है अथवा पहले का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी स्वयं लघु हो जाते हैं  
उदाहरण = पत्र= २१, वक्र = २१, यक्ष = २१, कक्ष - २१, यज्ञ = २१, शुद्ध =२१ क्रुद्ध =२१
गोत्र = २१, मूत्र = २१,

क्रमांक ८. (१) अनुसार संयुक्ताक्षर स्वयं लघु हो जाते हैं

८. (२) यदि संयुक्ताक्षर से शब्द प्रारंभ हो तो संयुक्ताक्षर लघु हो जाते हैं
उदाहरण = त्रिशूल = १२१, क्रमांक = १२१, क्षितिज = १२

क्रमांक ८. (२) अनुसार संयुक्ताक्षर स्वयं लघु हो जाते हैं

८. (३) संयुक्ताक्षर जब दीर्घ स्वर युक्त होते हैं तो अपने पहले के व्यंजन को दीर्घ करते हुए स्वयं भी दीर्घ रहते हैं अथवा पहले का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी दीर्घ स्वर युक्त संयुक्ताक्षर दीर्घ मात्रिक गिने जाते हैं
उदाहरण =
प्रज्ञा = २२  राजाज्ञा = २२२, पत्रों = २२  

क्रमांक ८. (३) अनुसार संयुक्ताक्षर स्वर के जुडने से दीर्घ होते हैं तथा यह क्रमांक ३ के अनुसार लघु हो सकते हैं

८ (४) उच्चारण अनुसार मात्रा गणना के कारण कुछ शब्द इस नियम के अपवाद भी है -
उदाहरण = अनुक्रमांक = अनु/क्र/मां/क = २१२१ (’नु’ अक्षर लघु होते हुए भी ’क्र’ के योग से दीर्घ नहीं हुआ और उच्चारण अनुसार अ के साथ जुड कर दीर्घ हो गया और क्र लघु हो गया)      

क्रमांक ८. (४) अनुसार संयुक्ताक्षर स्वयं लघु हो जाते हैं

क्रमांक ९ - विसर्ग युक्त व्यंजन दीर्ध मात्रिक होते हैं ऐसे व्यंजन को १ मात्रिक नहीं गिना जा सकता
उदाहरण = दुःख = २१ होता है इसे दीर्घ (२) नहीं गिन सकते यदि हमें २ मात्रा में इसका प्रयोग करना है तो इसके तद्भव रूप में ’दुख’ लिखना चाहिए इस प्रकार यह दीर्घ मात्रिक हो जायेगा

क्रमांक ९ अनुसार विसर्ग युक्त दीर्घ व्यंजन को गिरा कर लघु नहीं कर सकते हैं

अतः यह स्पष्ट हो गया है कि हम किन दीर्घ को लघु कर सकते हैं और किन्हें नहीं कर सकते, परन्तु यह अभ्यास से ही पूर्णतः स्पष्ट हो सकता है जैसे कुछ अपवाद को समझने के लिए अभ्यास आवश्यक हैद्य
उदाहरण स्वरूप एक अपवाद देखें = “क्रमांक ३ अनुसार“ मात्रा गिराने के नियम में बताया गया है कि ’ऐ’ स्वर तथा ’ऐ’ स्वर युक्त व्यंजन को नहीं गिरा सकते हैद्य जैसे - “जै“ २ को गिरा कर लघु नहीं कर सकते परन्तु अपवाद स्वरूप “है“ “हैं“ और “मैं“ को दीर्घ मात्रिक से गिरा कर लघु मात्रिक करने की छूट है
अभी अनेक नियम और हैं जिनको जानना आवश्यक है पर उसे पहले कुछ अशआर की तक्तीअ की जाये जिसमें मात्रा को गिराया गया हो
उदाहरण - १
जिंदगी में आज पहली बार मुझको डर लगा
उसने मुझ पर फूल फेंका था मुझे पत्थर लगा

तू मुझे काँटा समझता है तो मुझसे बच के चल
राह का पत्थर समझता है तो फिर ठोकर लगा

आगे आगे मैं नहीं होता कभी नज्मी मगर
आज भी पथराव में पहला मुझे पत्थर लगा
(अख्तर नज्मी)
नोट - जहाँ मात्रा गिराई गई है मिसरे में वो अक्षर और मात्रा बोल्ड करके दर्शाया गया है आप देखें और मिलान करें कि जहाँ मात्रा गिराई गई है वह शब्द ऊपर बताए नियम अनुसार सही है अथवा नहीं

जिंदगी में / आज पहली / बार मुझको / डर लगा
  २१२२  /   २१२२   /    २१२२   /   २१२
उसने मुझ पर / फूल फेंका / था मुझे पत् / थर लगा
  २१२२  /   २१२२   /    २१२२   /   २१२

तू मुझे काँ / टा समझता / है तो मुझसे / बच के चल
   २१२२  /   २१२२   /    २१२२   /   २१२
राह का पत् / थर समझता / है तो फिर ठो / कर लगा
   २१२२  /   २१२२   /    २१२२   /   २१२

आगे आगे / मैं नहीं हो / ता कभी नज् / मी मगर
  २१२२  /   २१२२   /    २१२२   /   २१२
आज भी पथ / राव में पह / ला मुझे पत् / थर लगा
  २१२२  /   २१२२   /    २१२२   /   २१२

उदाहरण - २

उसे अबके वफाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी
मगर इस बार मुझको अपने घर जाने की जल्दी थी

मैं अपनी मुट्ठियों में कैद कर लेता जमीनों को
मगर मेरे क़बीले को बिखर जाने की जल्दी थी

वो शाखों से जुदा होते हुए पत्ते पे हँसते थे
बड़े जिन्दा नज़र थे जिनको मर जाने की जल्दी थी
(राहत इन्दौरी)

उसे अबके / वफाओं से / गुज़र जाने / की जल्दी थी
१२२२    /    १२२२   /  १२२२   /   १२२२
मगर इस बा/ र मुझको अप/ ने घर जाने / की जल्दी थी
१२२२    /    १२२२    /    १२२२    /   १२२२

मैं अपनी मुट् / ठियों में कै / द कर लेता / जमीनों को
१२२२     /    १२२२    /    १२२२    /   १२२२
मगर मेरे / क़बीले को / बिखर जाने / की जल्दी थी
१२२२    /    १२२२    /    १२२२    /   १२२२

वो शाखों से / जुदा होते / हुए पत्ते / पे हँसते थे
१२२२    /  १२२२   /  १२२२   /   १२२२
बड़े जिन्दा / नज़र थे जिन / को मर जाने / की जल्दी थी
१२२२    /    १२२२    /    १२२२    /   १२२२

उदाहरण - ३

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं

एक कब्रिस्तान में घर मिल रहा है
जिसमें तहखानों से तहखाने लगे हैं
(दुष्यंत कुमार)

कैसे मंज़र / सामने आ / ने लगे हैं
  २१२२  /   २१२२   /  २१२२
गाते गाते / लोग चिल्ला / ने लगे हैं
  २१२२  /   २१२२   /  २१२२

अब तो इस ता / लाब का पा / नी बदल दो
      २१२२  /   २१२२   /  २१२२
ये कँवल के /  फूल कुम्हला / ने लगे हैं
    २१२२  /    २१२२   /  २१२२

एक कब्रिस् / तान में घर / मिल रहा है
  २१२२  /   २१२२   /  २१२२
जिसमें तहखा / नों से तहखा / ने लगे हैं
  २१२२  /   २१२२   /  २१२२


इस प्रकार यह स्पष्ट हुआ कि हम किन दीर्घ मात्रिक को गिरा सकते हैं
अब मात्रा गिराने को काफी हद तक समझ चुके हैं और यह भी जान चुके हैं कि कौन सा दीर्घ मात्रिक गिरेगा और कौन सा नहीं गिरेगाद्य
ब) अब हम इस प्रश्न का उत्तर खोजते हैं कि शब्द में किस स्थान का दीर्घ गिर सकता है और किस स्थान का नहीं गिर सकता -
नियम अ के अनुसार हम जिन दीर्घ को गिरा कर लघु मात्रिक गिन सकते हैं शब्द में उनका स्थान भी सुनिश्चित है अर्थात हम शब्द के किसी भी स्थान पर स्थापित दीर्घ अक्षर को अ नियम अनुसार  नहीं गिरा सकते
उदाहरण - पाया २२ को पाय अनुसार उच्चारण कर के २१ गिन सकते हैं परन्तु पया अनुसार १२ नहीं गिन सकते

प्रश्न उठता है कि, जब पा और या दोनों में एक ही नियम (क्रमांक ३ अनुसार) लागू है तो ऐसा क्यों कि ’या’ को गिरा सकते हैं ’पा’ को नहीं ?
इसका उत्तर यह है कि हम शब्द के केवल अंतिम दीर्घ मात्रिक अक्षर को ही गिरा सकते हैं शब्द के आखि़री अक्षर के अतिरिक्त किसी और अक्षर को नहीं गिरा सकते
कुछ और उदाहरण देखें -
उसूलों - १२२ को गिरा कर केवल १२१ कर सकते हैं इसमें हम “सू“ को गिरा कर ११२ नहीं कर सकते क्योकि ’सू’  अक्षर शब्द के अंत में नहीं है  
तो - २ को गिरा कर १ कर सकते हैं क्योकि यह शब्द का आखि़री अक्षर है
बोलो - २२ को गिरा कर २१ अनुसार गिन सकते हैं
(पोस्ट के अंत में और उदाहरण देखें)

नोट - इस नियम में कुछ अपवाद भी देख लें -
कोई, मेरा, तेरा शब्द में अपवाद स्वरूप पहले अक्षर को भी गिरा सकते हैं)    
कोई - २२ से गिरा कर केवल २१ और १२ और ११ कर सकते हैं पर यह २ नहीं हो सकता है
मेरा - २२ से गिरा कर केवल २१ और १२ और ११ कर सकते हैं पर यह २ नहीं हो सकता है
तेरा - २२ से गिरा कर केवल २१ और १२ और ११ कर सकते हैं पर यह २ नहीं हो सकता है
-----------------------------------------------------------------------------------------
अब यह भी स्पष्ट है कि शब्द में किन स्थान पर दीर्घ मात्रिक को गिरा सकते हैं

स) अब यह जानना शेष है कि किन शब्दों की मात्रा को कदापि नहीं गिरा सकते -

१) हम किसी व्यक्ति अथवा स्थान के नाम की मात्रा कदापि नहीं गिरा सकते
उदाहरण - (द्य)- “मीरा“ शब्द में अंत में “रा“ है जो क्रमांक ३ अनुसार गिर सकता है और शब्द के अंत में आ रहा है इसलिए नियमानुसार इसे गिरा सकते हैं परन्तु यह एक महिला का नाम है इसलिए संज्ञा है और इस कारण हम मीरा(२२) को “मीर“ उच्चारण करते हुए २१ नहीं गिन सकतेद्य “मीरा“ शब्द सदैव २२ ही रहेगा इसकी मात्रा  किसी दशा में नहीं गिरा सकते द्य यदि ऐसा करेंगे तो शेअर दोष पूर्ण हो जायेगा
(द्यद्य)- “आगरा“ शब्द में अंत में “रा“ है जो क्रमांक ३ अनुसार गिरा सकते है और शब्द के अंत में “रा“ आ रहा है इसलिए नियमानुसार गिरा सकते हैं परन्तु यह एक स्थान का नाम है इसलिए संज्ञा है और इस कारण हम आगरा(२१२) को “आगर“ उच्चारण करते हुए २२ नहीं गिन सकतेद्य “आगरा“ शब्द सदैव २१२ ही रहेगा द्य इसकी मात्रा  किसी दशा में नहीं गिरा सकते द्य यदि ऐसा करेंगे तो शेअर दोष पूर्ण हो जायेगा

२) ऐसा माना जाता है कि हिन्दी के तत्सम शब्द की मात्रा भी नहीं गिरानी चाहिए
उदाहरण - विडम्बना शब्द के अंत में “ना“ है जो क्रमांक ३ अनुसार गिरा सकते है और शब्द के अंत में “ना“ आ रहा है इसलिए नियमानुसार गिरा सकते हैं परन्तु विडम्बना एक तत्सम शब्द है इसलिए इसकी मात्रा नहीं गिरानी चाहिए  परन्तु अब इस नियम में काफी छूट ले जाने लगे है क्योकि तद्भव शब्दों में भी खूब बदलाव हो रहा है और उसके तद्भव रूप से भी नए शब्द निकालने लगे हैं
उदाहरण - दीपावली एक तत्सम शब्द है जिसका तद्भव रूप दीवाली है मगर समय के साथ इसमें भी बदलाव हुआ है और दीवाली में बदलाव हो कर दिवाली शब्द प्रचलन में आया तो अब दिवाली को तद्भव शब्द माने तो उसका तत्सम शब्द दीवाली होगा इस इस अनुसार दीवाली को २२१ नहीं करना चाहिए मगर ऐसा खूब किया जा रहा है  और लगभग स्वीकार्य है द्य मगर ध्यान रहे कि मूल शब्द दीपावली (२२१२) को गिरा कर २२११ नहीं करना चाहिए
यह भी याद रखें कि यह नियम केवल हिन्दी के तत्सम शब्दों के लिए है द्य उर्दू के शब्दों के साथ ऐसा कोई नियम नहीं है क्योकि उर्दू की शब्दावली में तद्भव शब्द नहीं पाए जाते
(अगर किसी उर्दू शब्द का बदला हुआ रूप प्रचलन में आया है तो वह  शब्द उर्दू भाषा से से किसी और भाषा में जाने के कारण बदला है जैसे उर्दू का अलविदाअ २१२१ हिन्दी में अलविदा २१२ हो गया, सहीह(१२१) ब्बदल कर सही(१२)  हो गया शुरुअ (१२१) बदल कर शुरू(१२) हो गया मन्अ(२१) बदल कर मना(१२) हो गया, और ऐसे अनेक शब्द हैं जिनका स्वरूप बदल गया मगर इनको उर्दू का तद्भव शब्द कहना गलत होगा )

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अब जब सारे नियम साझा हो चुके हैं तो कुछ ऐसे शब्द को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करता हूँ जिनकी मात्रा को गिराया जा सकता है

नोट - इसमें जो मात्रा लघु है उसे ’१’ से दर्शाया गया है
जो २ मात्रिक है परन्तु गिरा कर लघु नहीं किया जा सकता उसे ’२’ से दर्शाया गया है
जो २ मात्रिक है परन्तु गिरा कर लघु कर सकते हैं उसे ’ü’ से दर्शाया गया है

राम - २१
नजर - १२
कोई - üü
 मेरा - üü
तेरा - üü
और - २१ अथवा २
क्यों - २
सत्य - २१
को - ü
मैं - ü
है - ü
हैं - ü
सौ - २
बिछड़े - २ü
तू - ü
जाते - २ü
तूने - २ü
मुझको - २ü

निवेदन है कि ऐसी एक सूचि आप भी बना कर कमेन्ट में लिखें
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मात्रा गिराने के बाद मात्रा गणना से सम्बन्धित कुछ अन्य बातें जिनका ध्यान रखना आवश्यक है -

स्पष्ट कर दिया जाये कि किसी(१२) को गिरा गर  किसि (११) कर सकते हैं परन्तु इसे हम मात्रा गणना क्रमांक ६.१ अनुसार दीर्घ मात्रिक नहीं मन सकते “किसी“ मात्रा गिरने के बाद ११ होगा और सदैव दो स्वतंत्र लघु ही रहेगा किसी दशा में दीर्घ नहीं हो सकता द्य
इसी प्रकार आशिकी (२१२) को गिरा कर आशिकि २११ कर सकते हीं परन्तु यह २२ नहीं हो सकता    
परन्तु इसका भी अपवाद मौजूद है उसे भी देखें - और(२१) में पहले अक्षर को अपवाद स्वरूप गिराते हैं तथा अर अनुसार पढते हुए “दीर्घ“ मात्रिक मान लेते हैंद्य यहाँ याद रखें कि “और“ में “र“ नहीं गिरता इसलिए “औ“ लिख कर इसे लघु मात्रिक नहीं मानना चाहिएद्य यह अनुचित है द्य  

याद रखे -

कुछ ऐसे शब्द हैं जिनके दो या दो से अधिक उच्चारण प्रचिलित और मान्य हैं
जैसे राहबर(२१२) के साथ रहबर(२२) भी मान्य है मगर यह मात्रा गिराने के नियम के कारण नहीं है,इस प्रकार के कुछ और शब्द देखें -

१ - तरह (१२) - तर्ह (२१)
२ - राहजन (२१२) - रहजन (२२)
३ - दीपावली (२२१२) - दीवाली (२२२) - दिवाली (१२२)
४ - दीवाना (२२२) - दिवाना (१२२)
५ - नदी (१२) - नद्दी (२२)
६ - रखी (१२) - रक्खी (२२)
७ - उठी (१२) - उट्ठी (२२)
८ - शुरुअ (१२१) - शुरू (१२)
९ - सहीह (१२१) - सही (१२)
१० - शाम्अ (२१) - शमा (१२)
११ - अलविदाअ (२१२१) - अलविदा (२१२)
१२ - ग्लास (२१) - गिलास (१२१)
१३ - जियादः (१२२) - ज्यादा (२२)
१४ - वगर्ना (१२२) - वर्ना (२२)
१५ - आईना (२२२) - आइना (२१२ )
१६ - एक (२१) - इक (२)   ........ आदि

मेरे मुक्तक
1. पीसो जो मेंहदी तो, हाथ में रंग आयेगा ।
बोये जो धान खतपतवार तो संग आयेगा ।
है दस्तुर इस जहां में सिक्के के होते दो पहलू
दुख सहने से तुम्हे तो जीने का ढंग आयेगा ।।

2. अंधियारा को चीर, एक नूतन सबेरा आयेगा ।
राह बुनता चल तो सही तू, तेरा बसेरा आयेगा ।।
हौसला के ले पर, उडान जो तू भरेगा नीले नभ ।
देख लेना कदमो तले वही नभ जठेरा आयेगा ।
2. क्रोध में जो कापता, कोई उसे भाते नही ।
हो नदी ऊफान पर, कोई निकट जाते नही ।
कौन अच्छा औ बुरा को जांच पाये होष खो
हो घनेरी रात तो साये नजर आते नहीं।
3. कहो ना कहो ना मुझे कौन हो तुम ,
सता कर  सता कर  मुझे मौन हो तुम ।
कभी भी कहीं का किसी का न छोड़े,
करे लोग काना फुसी पौन हो तुम ।।
पौन-प्राण
4. काया कपड़े विहीन नंगे होते हैं ।
झगड़ा कारण रहीत दंगे होते हैं।।
जिनके हो सोच विचार ओछे दैत्यों सा
ऐसे इंसा ही तो लफंगे होते हैं ।।
5. तुम समझते हो तुम मुझ से दूर हो ।
जाकर वहां अपने में ही चूर हो ।।
तुम ये लिखे हो कैसे पाती मुझे,
समझा रहे क्यों तुम अब मजबूर हो ।।
6. बड़े बड़े महल अटारी और मोटर गाड़ी उसके पास
यहां वहां दुकान दारी  और खेती बाड़ी उसके पास ।
बिछा सके कही बिछौना इतना पैसा गिनते अपने हाथ,
नही कही सुकुन हथेली, चिंता कुल्हाड़ी उसके पास ।।
7. तुझे जाना कहां है जानता भी है ।
चरण रख तू डगर को मापता भी है ।।
वहां बैठे हुये क्यों बुन रहे सपना,
निकल कर ख्वाब से तू जागता भी है ।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

शमि गणेश मंदिर नवागढ.


 

गांव नवागढ़ मोर हे, छत्तीसगढ़ म एक ।

नरवरगढ़ के नाव ले, मिले इतिहास देख ।।

मिले इतिहास देख, गोड़वाना के चिन्हा ।

राजा नरवरसाय के, रहिस गढ़ सुघ्घर जुन्हा ।।

जिहांव हवे हर पाँव, देव देवालय के गढ़ ।

गढ़ छत्तीस म एक, हवय गा एक नवागढ़ ।।

 छत्तीसगढ़ हा अपन नाम के संग ‘छत्तीस‘ गढ़ ला समेटे हे । राजतंत्र के समय छत्तीसगढ़ के जीवन दायनी षिवनदी के उत्तर दिषा मा 18 अउ दक्षिण दिषा में 18 गढ़ होत रहिस । उत्तर दिषा के गढ़ मन के राजधानी रतनपुर अउ दक्षिणा दिषा के राजधानी रायपुर रहिस।  षिवनादी के उत्तर दिषा म रतनपुर राजधानी के अंतर्गत एक गढ़ रहिस ‘नरवरगढ़‘ ।  अइसे मान्यता हे के ये नाम ओ समय के तत्कालिक राजा नरवर साय के नाम म पड़े हे । बाद म येही ‘नरवरगढ़‘ हा ‘नवागढ़‘ के नाम ले जाने जाने लगिस । वर्तमान म ये नवागढ़ छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिला मुख्यालय ले उत्तर दिषा में ‘बेमेतरा-मुंगेली‘ राजमार्ग म 25 किमी के दूरी म स्थित हे । नवागढ़ म पहली ‘छै आगर छै कोरी‘ यने कि 126 तालाब होत रहिस फेर अभी अतका कन नई हे तभो ले आज घला गली-गली म तरिया देखे ल मिल जथे । कहे जाथे-

‘‘हमर नवागढ़ के नौ ठन पारा,

जेती देखव जल देवती के धारा ।‘‘

नरवर साय के दो पत्नी रहिस ।  मानाबाई अउ भगना बाई ।  राजा ह अपन पत्नी मन के नाम म तालाब बनवाये हें जउन आज मानाबंद अउ भगना बंद के नाम ले प्रसिद्ध हे । नवागढ़ म बहुत अकन मंदिर हे, जेमा बहुत अकन ह प्राचीन हें । नवागढ़ के उत्ती दिषा म चांदाबन स्थित माँ षक्ति के मंदिर, षंकरनगर म स्वयंभू महादेव के मंदिर, बुड़ती म मां महामाया, माँ षारदा के मंदिर, उत्तर दिषा में भैरव बाबा के मंदिर, जुड़ावनबंद के तीर म लक्ष्मीनारायण के मंदिर, दक्षिण दिषा षंकरजी के मंदिर, मध्यभाग में राममंदिर, लखनी मंदिर, दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर,, ठाकुर देव के मंदिर स्थित हे येही मंदिर मन मा सबले जुन्ना मंदिर ‘गणेष मंदिर‘ हे -

जुन्ना मंदिर मा हवे, गणेशजी के मान ।

संग शमी के पेड़ हे, जेखर अपने शान ।।

जेखर अपने शान, हवन पूजा म जरूरी ।

गणेष देवा संग, शमी मा चढ़े खुरहुरी ।

दुलभ हे संयोग, शमी गणेष के मिलना ।

अइसन ठउरे तीन, कले ‘कल्याणे‘ जुन्ना ।।

नवागढ़ बस्ती के बीचो-बीच, देह के करेजा कस नवागढ़ म गणेष मंदिर विराजित हे, जउन जनआस्था के केन्द्र होय के साथ-साथ ऐतिहासिक अउ पुरातात्विक महत्व के घला हे ।  जनश्रुति के अनुसार नवागढ़ म नरवरसाय के पहिली भोसले राजा मन के राज रहिस । भोसले राज परिवार के ईष्ट देवता गणेषजी ल माने गे हे, येही बात ह अपन आप म प्रमाण कस लगथे के ये मंदिर के निर्माण भोसले राज परिवार द्वारा कराये गे हे । मान्यता हे के ये मंदिर के निर्माण विक्रम संवत 646 म होय हे । 646 के गणेष चतुर्थी के दिन ये मंदिर के तांत्रिक विधि ले प्राण प्रतिश्ठा कराय गे हे । 

ये मंदिर के गर्भगृह ह लगभग 6 फुट व्यास के अउ लगभग 25 फुट ऊंचा हवय । गर्भ गृह म  6 फूट के एके ठन पथरा मा भगवान गणेश के पदमासन मुद्रा उकेरे गे हे । लगभग ढाई फुट आसन म साढे तीन फुट भगवान गणेष के प्रतिमा भव्य दिखत हे । ये प्रतिमा हा नागपुर, केलझर म स्थित सिद्ध विनायक के प्रतिमामन ले भिन्न हे ऊंहा के प्रतिमा मा केवल मुँह के आकृति विषाल रूप म उकेरे गे हे जबकी इहां के प्रतिमा म पूरा देहाकृति उकेरे गे हे । 

ये मंदिर के जीर्णोधर तीन बार होय हे पहिली ईसवी सन 1880 म मंदिर म लगे षिलालेख येही जीर्णोधार ह उल्लेखित हे । दूसर जीर्णोधर सन् 1936 म तीसर जीर्णाधार अभी-अभी 2009-10 म होय हे । ये तीनो जीर्णोधार म केवल परसार म परिवर्तन करे गे जबकि गर्भगृह ह ज्यों के त्यों हे । वर्तमान म ये मंदिर के परसार (प्रसाद) के नवनिर्माण कराये गे हे । ये परसार लगभग 40 गुणा 30 वर्ग फुटके  हे ये परसार के चारो कोनो म चारठन छोटे-छोटे मंदिर बनाय गे हे जउन जुन्ना मंदिर म पहिली ले रहिस फेर ओ प्रतिमा मन के जीर्ण-षिर्ण होय के कारण प्रतिमा घला नवा रख के फेर से प्राणप्रतिष्ठा कराये गे हे । ईषान म बजरंग बली, आग्नेय म राम दरबार एक दूसर के सम्मुख व्यवस्थित हे ।  नैऋत्य म राधकृष्ण अउ वाव्वय म षिवलिंग षिवदरबार के नव निर्माण कराये गे हे । मुख्य मंदिर गणेषजी गर्भगृह अउ प्रतिमा अपन निर्माण काल ले अब तक ज्यों के त्यों हे । गणेषजी पूर्वाभीमुख हें । नवा कलेवर म सजे मंदिर परिसर अउ मुख्य द्वार ह घातेच के सुग्घर लगत हे ।

मंदिर के आघू मा उत्ती मा तब ले अब तक एक ठन शमी के पेड़ हवय, जेखर सेती ऐला ‘श्री शमी गणेश’ के नाम ले जाने जाथे । गांव के बुर्जुग मन बताथें के पहिली दू ठन शमी के पेड़ रहिस । मंदिर  गणेश के मंदिर अउ ओखर तीर शमी के पेड़ के दुर्लभ संयोग हे ।  परसिद धार्मिक पत्रिका ‘कल्याण’ के ‘गणेश विशेषांक’ मा ये बात के उल्लेख हे के अइसन संयोग भारत मा कुछ एक जगह हे जेमा एक नवागढ़ ह आय । मंदिर के उत्तर दिषा म एक ठन  कुआं हे जेखर जगत अष्टकोणीय हे ।  ये अष्टकोणीय कुंआ ह तांत्रिक विधान के कुआं आय ।  मंदिर के दक्षिण भाग म एक ठन मठ हे, मंदिर के उत्ती म मंदिर ले लगभग 50 मीटर के दूरी म चरण-पादुका हे । बुड़ती म एकअउ कुंआ हे ।

श्री शमी गणेशजी आज नवागढ़ के रहईया के संगे संग दूरिहा दूरिहा ले श्रद्धा ले के अवईया जम्मो भगत मन के मन के मुराद ला पूरा करत हे ।

अतका प्राचीन मंदिर होय के बाद भी नवागढ़ के ओ प्रसिद्धी नई हो पाये हे जेखर ये अधिकारी हे । शासन अउ स्थानीय प्रषासन के उपेक्षा के षिकार म ये मंदिर अपन स्वरूप म प्रगट नई हो पावत हे । मंदिर के आघू म पहिली दू ठन शमि पेड़ रहिस जेमा एक पेड़ ल कोनो काट डारे हे । मंदिर के बाचे एक ठन शमि वृक्ष, मठ, चरण पादुका कोन मेर हे खोजे ल लगथे काबर ये मन म मंदिर के तीर-तीर म बसइया मन के कब्जा म हे । मंदिर के धरोहर ल मुक्त कराये बर कोखरो ध्यान नई जावय । मंदिर के देख रेख करईया श्री रामधुन रजक के अनुसार ये मंदिर परिसर के क्षेत्रफल सरकारी रिकार्ड के अनुसार 1840 वर्गफुट हे फेर वर्तमान म अतका कन नई हे । ओइसने ये मंदिर के नाम म 25 एकड़ कृषि भूमि दर्ज हे फेर मंदिर के अधिकार म एको एकड़ जमीन नई हे ।

यदि ये मंदिर ला शासन के संरक्षण प्राप्त हो जय येखर धरोहर मन ल मुक्त कराके मंदिर ल सउप दे जाये त ये पुरातात्विक महत्व के मंदिर ह पूरा विष्व म अपन नाम करे म समर्थ हे ।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

//मंदिरों का गढ़-‘नवागढ़‘//




 छत्तीसगढ़ अपने नाम के ही साथ ‘छत्तीस‘ गढ़ को समेटा हुआ है । राजतंत्र के समय छत्तीसगढ़ के जीवन दायनी शिवनाथ नदी के उत्तर दिशा में 18 एवं दक्षिण दिशा में 18 गढ़ हुआ करता था । उत्तर दिशा के गढ़ों की राजधानी रतनपुर एवं दक्षिणा दिशा के गढ़ों की राजधानी रायपुर था ।  शिवनाथ नदी के उत्तर दिशा में रतनपुर राजधानी के अंतर्गत एक गढ़ था जिसका नाम ‘नरवरगढ़‘ था ।  ऐसी मान्यता है कि यह नाम उस समय के तात्कालिक राजा नरवर साय के नाम पर पड़ा होगा । कलान्तर में इसी ‘नरवरगढ़‘ को ‘नवगढ़‘ फिर ‘नवागढ़‘ के नाम से जाने जाना लगा । वर्तमान में यह नवागढ़ छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिला मुख्यालय से उत्तर दिशा में ‘बेमेतरा-मुंगेली‘ मार्ग पर 25 किमी की दूरी पर स्थित है । नवागढ़ में पहले ‘छै आगर छै कोरी‘ अर्थात 126 तालाब बताया जाता है किन्तु वर्तमान में नही है किन्तु आज भी हर मोहल्लें में तालाब दृश्टिगोचर है, इसिलिये कहा जाता है-
 ‘‘हमर नवागढ़ के नौ ठन पारा,
 जेती देखव जल देवती के धारा ।‘‘
नरवर साय की दो पत्नियां मानाबाई एवं भगना बाई थी ।  राजा ने अपनी पत्नियों के नाम पर मानाबंद एवं भगना बंद तालाब बनवाये जो आज भी प्रसिद्ध है । नवागढ़ में अनेक मंदिर हैं, जिनमें अधिकाश प्राचीन हैं । नवागढ़ के पूर्व दिशा में चांदाबन स्थित माँ शक्ति का मंदिर, शंकरनगर में मांगनबंद तालाब तट पर स्वयंभू महादेव का मंदिर, पश्चिम में मां महामाया एवं माँ शारदे का मंदिर, उत्तर दिशा में भैरव बाबा का मंदिर, जुड़ावनबंद के समीप लक्ष्मीनारायण का मंदिर, दक्षिण दिशा में नवातालाब के तट पर बाउली के पास शंकरजी का मंदिर,, मध्यभाग में राम-कृष्ण मंदिर, मां लखनी मंदिर, नगर पंचायत प्रांगण में दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर, श्रीशमिगणेश मंदिर,, ठाकुर देव का मंदिर इन प्रमुख मंदिरो के अतिरिक्त और कई मंदिर हैं । छोइहा नाला के किनारे गुरूसिंग सभा गुरूद्वारा,, देवांगनपारा-सुकुलपारा मार्ग पर मोहरेंगिया नाला के तट पर मस्जिद भ्, तिलकापारा में संत गुरू घासीदास के जैतखाम एवं गुरूद्वारा, जुड़ावनबंद के सपीप महान संत रविदास का रैदास मंदिर स्थित है ।   586 ईसवी के आस-पास नरवर साय द्वारा माँ महामाया, गणेश मंदिर, भैरव बाबा, हनुमान मंदिर एवं बुढ़ामहादेव मंदिर का निर्माण कराया गया है ।  इन मंदिरों के संबंध में कई-कई जनश्रुतियां प्रचलित रही हैं । जिनमें प्रमुख मंदिर इस प्रकार हैं-

माँ महामाया मंदिर-
माँ महामाया को नरवरगढ़ राजा के कुल देवी के रूप माना जाता है । यह मंदिर मानाबंद के पश्चिमी तट पर स्थित है । माँ की प्रतिमा लगभग 6 फिट की है ।  गाँ का मुख भव्य प्रदिप्तमान है । बुजुर्ग बतलातें हैं कि पूर्व में  व्यक्ति माँ से आँख मिलाने से भय खाते थे क्योंकि माँ का रूप् तेजवान है । आज छत्तीसगढ़ी परिवेष में माँ का श्रृंगार माँ के भक्तों को अनायाष ही अपनी ओर आकर्शित करते है ।  चूंकि प्राचीन मंदिर आज विद्यमान नही है इसलिये मंदिर शिल्प के आधार पर निर्माण काल का ठीक-ठीक निर्धारण नहीं किया जा सकता । मान्यता है कि माँ की प्रतिमा वही है यद्यपी मंदिर के कई-कई  जीर्णोद्धार में मंदिर का कलेवर परिवर्तित हो चुका है । गांव के बुजुर्ग बतलाते हैं कि 1964 में इस मंदिर का जीणोद्धार कराने मूर्ति को हटाने की आवश्यकता हुई कई लोग एक साथ मूर्ति को हटाने प्रयास किये किन्तु मूर्ति टस से मस नही हुई ।  फिर 11 विप्र दुर्गासप्तशती का एक साथ पाठ किये तब जाकर मूर्ति हल्का हुआ और उसे वहां से हटाया जा सका । एक मान्यता के अनुसार नवागढ़ की महामाया एवं रतनपुर की महामाया एक ही समय के हैं । रतनपुर एवं नवागढ़ महामाया में एक साम्य है । महामाया रतनपुर के समीप भी तालाब है एवं महामाया नवागढ़ के पास भी तालाब है । एक जन श्रुति के अनुसार नवागढ़ के तालाब से रतनपुर के इस तालाब तक एक सुरंग है ।  जिस प्रकार रतनपुर महामाया के संबंध में जनश्रुति है कि तीन बहनों में एक बहन काली के रूप में कलकत्ता में निवास करती उसी प्रकार मान्यता है कि नवागढ़ के महामाया के तीन बहनों में एक ‘गोबर्रा दहरा‘ (दामापुर, जिला कबीरधाम) में एवं एक समीपस्थ ग्राम बुचीपुर में विराजित है । बुचीपुर माँ महामाया संस्थान इस बात को स्वीकार करती है बुचीपुर माँ महामाया को नवागढ़ से लाया गया है । नवागढ़ महामाई अपने भक्तों के बीच मनोकामना पूर्ण करने वाली देवी के रूप में विख्यात है ।  भक्त प्रेम से माँ को ‘बुढ़ीदाई‘, ‘नवगढ़िन दाई‘ भी पुकारते हैं ।

श्रीशमिगणेश मंदिर-
नवागढ़ के हृदय स्थल पर भगवान गणेश का एक मंदिर व्यवस्थित है । इस मंदिर के निर्माण के संबंध में मान्यता है कि संवत 646 में इस मंदिर का निर्माण तांत्रिक विधि से कराई गई थी । इस मंदिर के निर्माण के संबंध दो प्रकार की विचार धारा प्रचलित है, एक विचार के अनुसार इस मंदिर का निर्माण नरवरगढ़ के राजा नरवरसाय द्वारा कराया जाना मानते हैं तो दूसरी मान्यता के अनुसार इस मंदिर का निर्माण गोड़वाना राज के पूर्व के राजा जो भोसले (मराठी) परिवार द्वारा कराया गया मानते हैं ।  इस संबंध में श्री सुरेन्द्र कुमार चौबे तर्क देते हुये कहते हैं कि चूंकि गणेश मराठों का ईष्ट देव है एवं गोड़ राजा मराठी राजा को पराजित कर यहां अपना अधिपत्य स्थापित किये थे इसलिये इस मंदिर का निर्माण का श्रेय मराठा परिवार को देना न्याय संगत लगता है । 6 फीट के एक पत्थर पर भगवान गणेशजी को पद्मासन मुद्रा में उकेरा गया है । इस मंदिर के दक्षिण भाग में एक अश्टकोणीय कुँआ विद्यमान है । इस मंदिर के सम्मुख पहले दो शमि का वृक्ष था, जिसमें एक आज भी स्थित है ।  इसी कारण इस मंदिर को ‘श्रीशमि गणेश मंदिर‘ कहा जाता है । गणेश मंदिर एवं शमिवृक्ष का यह दुर्लभ संयोग पूरे विश्व में केवल तीन स्थानों पर बतलाया जाता है ।  प्रसिद्ध धार्मिक पत्रिका ‘कल्याण‘ के ‘गणेश‘ अंक में इस मंदिर का उल्लेख मिलता है । मान्यता के अनुसार इस स्थान पर दो गणेश भक्त संत जीवित समाधी लिये थे । एक समाधी स्थल मंदिर से सटा हुआ े उत्तर दिशा में एवं एक पूर्व दिशा में 100 मीटर की दूरी पर स्थित है ।  मंदिर के शिलालेख उल्लेखित जानकारी के अनुसार 1880 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण परिवार द्वारा कराया गया ।  गर्भगृह को छोड़ कर शेष मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार ‘सिद्ध विनायक श्रीशमि गणेश मंदिर सेवा संस्थान‘ द्वारा 2013 में कराया गया है ।  जिससे मंदिर एक नये आकर्शक कलेवर में पर्यटकों को लुभाने में सफल रहा है ।

राममंदिर-
नवागढ़ के पूर्व दिशा में सुरकी तालाब के तट पर राममंदिर मठ है । इस परिकोटा में एक साथ रामजानकी मंदिर एवं राधाकृश्ण मंदिर व्यवस्थित है । मंदिर के महंत श्रीमधुबन दास वैश्णव के अनुसार वह इस मंदिर के आठवीं पीढ़ी के महंत हैं ।  लगभग 300 वर्श पूर्व इस मंदिर का निर्माण हुआ है ।  इस संबंध में एक जनश्रुति प्रचलित है कि इसी स्थान पर केवल कृष्ण मंदिर बनाने की योजना थी ।  कृष्ण मंदिर का निर्माण लगभग पूरा होने को था उसी समय राजस्थान जयपुर के कुछ मूर्तिकार मूर्ति बेचते एक दिन रात्रि होने पर विश्राम के उद्देश्य से यहां तालाब किनारे ठहरे दूसरे दिन जब ओ लोग यहां से जाने के लिये तैयार हुये तो राम-जानकी की प्रतिमा अपने स्थान पर अडिग हो गया ।  लगातार तीन दिन तक मूर्ति ले जाने का प्रयास हुआ किन्तु मूर्ति अचल हो गया थक-हार कर मूर्ति को इसी स्थान पर छोड़ना पड़ा इस चमत्कार से चमकृत होकर, कृष्ण मंदिर बनाने वाले लोग उसी मंदिर पर रामजानकी को स्थापित किये । उस मंदिर के लिये लाये गये कृष्ण-राधा का प्रतिमा आज भी रामजानकी प्रतिमा के बगल में स्थापित है । कुछ वर्षो बाद इस राममंदिर के बगल में दूसरा मंदिर बनाकर कृश्ण-राधा की नई मूर्ति स्थापित की गई । इस मंदिर में 700 एकड़ कृशि भूमि दान से प्राप्त हुआ था । जिसमें का एक बड़ा भाग शिलिंग में निकल गया ।  वर्तमान में इस मंदिर के पास 10 एकड़ कृषि भूमि शेष है । इस मंदिर में विभिन्न मठों के संतो का आगमन होता रहा है । 20 सदी के पूर्वाद्ध में यहां विद्यापीठ संचालित था जिसमें बच्चों को संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी ।  बाद में गरीब बच्चे इस मंदिर में रह कर शासकीय विद्यालय में अध्ययन करते थे । यह मंदिर एक सामाजिक केन्द्र के रूप में उभरा जहां गांव के लोग बैठ कर अध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतन किया करते थे । ये परम्परा कमोबेस आज भी बरकरार है ।

मां लखनी मंदिर-
लक्ष्मीजी को ‘लखनी देवी‘ के रूप में गांव के सुरकी तालाब के पास स्थापित किया गया है । यह मंदिर माँ महामाया मंदिर के समकालीन है । लखनी देवी की प्रतिमा लगभग 3 फीट ऊँची है ।  प्रतिमा अत्यंत मनोहारी है । इस मंदिर की मान्यता रही है कि इस देवी के पूजन करने वाले निःसंतान दम्पत्ती को निश्चित ही संतान सुख की प्राप्ति होती है ।  ऐसा माना जाता है कि लक्ष्मीजी को लखनी नाम से नवागढ़ में एवं रतनपुर में ही स्थापित किया गया है । लखनी मंदिर के समीप एक कुँआ है जो पहले पूरे गाँव के लिये पे जल का स्रोत रहा । जिसका जल अभिमंत्रित किया  हुआ है, जिसके लिए श्रद्धालू बड़े दूर-दूर से जल लेने के लिए आते थे तथा कुँए का जल निकालकर पहले खेतों में रोग ना आवे कह कर डालते थे ।  एक मान्यता के अनुसार इस मंदिर की मूर्ति इसी कुऐं के उत्खनन के समय प्राप्त हुआ था ।।

हनुमान मंदिर
-नवागढ़ के मध्य भाग में दक्षिणमुखी हुनमानजी स्थापित है ।  इसका निर्माण  मां महामाया के निर्माण के समय का ही बताया जाता है । पहले इस मंदिर के चारों ओर एक परिकोटा था, जिसमें गांव के युवा मल्लयुद्व का अभ्यास किया करते थे, इस कारण इस इस परिकोटो को ‘हनुमान अखड़ा‘ कहा जाता था ।  बाद में इस मंदिर के पास ग्राम पंचायत का निर्माण हुआ जहां आज नगर पंचायत संचालित है । हनुमान भक्त इस मंदिर को अत्यंत सिद्ध मंदिर निरूपित करते हैं । इस मंदिर के पास साधु समाधी का होना बतलाया जाता है । मान्यता के अनुसार इस स्थान पर कोई हनुमान भक्त संत जीवित समाधी लिये थे ।

भैरव बाबा का मंदिर-
 माँ महामाया मंदिर से उत्तर दिशा की ओर लगभग 1 किमी की दूरी पर भैरव बाबा का मंदिर स्थित है । वर्तमान में इस स्थान पर न वह प्राचिन मूर्ति है न ही प्राचिन मंदिर ।  किन्तु मान्यता है कि माँ महामाया निर्माण के आस-पास के वर्षो में भैरव बाबा का मंदिर यहां था ।  प्रमाण के रूप में गांव में भैरव भाठा नाम से से एक निरजन स्थान है जहां पर ऊँचे पीपल वृक्ष के नीचे भैरव बाबा के खण्ड़ित प्रतिमा रखा हुआ है ।  इसी के समीप एक नवीन भैरव बाबा का मंदिर बनवाया गया है जिसमें नई मूर्ति स्थापित है । इस प्रतिमा का प्राण प्रतिष्इा 1979 में कराया गया था ।  इस मंदिर का वर्तमान जीर्णोधार 2008 में हुआ है ।  गांव में महामाया एवं भैरव बाबा का संयोग इसे पुनः रतनपुर से ही जोड़ता है ।

स्वयंभू बुढ़ा महादेव-
गांव के पूर्व दिशा में मांगनबंद तालाब के तट पर स्वयंभू महादेव का मंदिर है । मान्यता है यह शिवलिंग स्वयं प्रगट है इसे अन्यत्र ला कर स्थापित नही कराया गया है ।  इस मंदिर में बाबा भोलेनाथ का शिवलिंग जलहरी के साथ उसी प्रकार शोभायमान है जैसे बनारस का विश्वनाथ । ऐसी मान्यता है कि नरवर साय के काल में ही इस मंदिर का निर्माण कराया गया था । पहले इस मंदिर में केवल शिवलिंग ही स्थापित था बाद में शिवपरिवार के रूप में  माता पार्वती एवं गणेशजी की प्रतिमा स्थापित कराई गई । मान्यता के अनुसार पहले यहां एक नाग-नागिन का जोडा रहा करता थ इसी कारण इस मंदिर के गर्भगृह के बाहर नाग-नागीन का प्रतिमा भी स्थापित है ।  इस मंदिर का जीणोद्धार दो से अधिक बार हो चुका है । सावनमास में यहां भक्तों का ताता लगा रहता है । महाशिवरात्रि के दिन इस मंदिर परिसर पर मेला  लगता है ।

शक्ति मंदिर-
गांव के पूर्व दिशा में ‘टेंगना‘ नाला के पास ‘चांदाबंद तालाब‘ के तट पर यह मंदिर विराजित है ।  इस मंदिर के संबंध में मंदिर के संचालक श्री चैन साहू  से प्राप्त जानकारी एवं जनश्रुति के अनुसार मुरता ग्राम के जयंत आचार्य के 7-8 पीढ़ी पूर्व कोई महिला अपने पति के चिता के साथ जीवित समाधी ली थी । जिसके स्मरण में इमली पेड़ के नीचे एक सती चबूतरा बनाया गया था ।  इसी चबूतरे पर सती नारी के प्रतिक के रूप में एक मूर्ति स्थापित किया गया था जिसे सती चौरा कहा गया । इस सती चौरा के पास इमली पेड़ के पास कई प्रकार के जहरीले सर्प निकला करते थे किन्तु आज तक कभी भी जन हानि नही हुई है । सन 1970 के आसपास इस चौरा को एक मंदिर रूप में परिणित कर मां शक्ति की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कराई गई । सन् 2000 से इस मंदिर को विस्तारित किया गया ।  आज भी मंदिर में एक साथ दो प्रतिमा स्थापित है, जिसमें से एक सती का एवं दूसरा मां शक्ति का है ।  इस मंदिर पर लोगों की अगाध आस्था है । आज भी इस स्थान पर सर्प निकलते रहते हैं किन्तु किसी प्रकार की हानी नही हुई है । जनमान्यता के अनुसार सर्पविष के व्याधी ग्रसित भगत के मां के श्रीचरणों में समर्पित होने पर जीवन प्राप्त होता है ।

मैहरवासनी मां शारदे का मंदिर-
महामाया मंदिर के पश्चिम दिश में जहां पर पहले राजा नरवर साय का कीला हुआ करता था, जहां पर लगभग 200 फीट ऊंचा टीला था । जिससे कीले की रक्षा के सैनिक दिनरात पहरा दिया करते थे कहा जाता है इस टीले से 4 कोस (लगभग 15 किमी) तक देखा जा सकता था । जिसके अव’शेष  के रूप 20 फीट का टीला था इसी टीले पर आज मैहर वासनी माँ शारदे का मनोहारी प्रतिमा स्थापित है ।  इसे मैहर वासनी माँ षारदे इसलिये कहा जाता है कि यह  प्रतिमा मैहर के माँ शारदे की अनुकृति है ।  यह एक नवीन मंदिर है जिसके संबंध में आज के हर अधेड़ उम्र के लोग जानते हैं । यह एक सत्य घटना है 1974 क शारदीय नवरात्र पर गांव के ग्राम पंचायत के पास सार्वसजनिक दुर्गोत्सव मनाया जा रहा था अंतिम दिन दुर्गा विर्सजन के लिये जस गीत गाया जा रहा था उसी समय अचानक श्री बिष्णु प्रसाद मिश्रा को अचानक कुछ अनुभूति हुई, उनका शरीर कँपने लगा, उन्हें देवी सवार हुआ । श्री मिश्राजी अपने आप को माँ शारदा होना बतलाया ।  ध्यान देने योग्य बात है कि श्री मिश्राजी को इनसे पूर्व किसी प्रकार देवी सवार नही हुआ था । वह इस टीले पर माँ मैहर वासनी षारदे का मंदिर बनाने की बात कही ।  जिसे गांव वाले स्वीकार कर लिये ।  इसके बाद ही वह शांत हुये ।  इस घटना के बाद से श्री मिश्राजी कई वर्षो तक दोनों नवरात में उसी स्थान पर माँ शारदे के तैल चित्र लेकर बैठा करते थे । श्री मुरेन्द्रधर दीवान, श्री विश्णु मिश्राजी के साथ सहयोगी के रूप में सेवा करते रहे । इस मंदिर के निर्माण हेतु नवागढ़ और आस-पास के गांव वालों से सहयोग लिया गया ।  इस मंदिर निर्माण के उद्देश्य से यहां ‘चंदैनी गोंदा‘ का कार्यक्रम कराया गया था ।  मंदिर निर्माण में पूरे क्षेत्र के लोगों का आर्थिक सहयोग रहा ।  अंत में श्रमदान से इस मंदिर का निर्माण कार्य कराया गया ।  श्री छन्नू गुप्ता द्वारा मां की प्रतिमा दान दी गई । 1996 में इस मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा कराया गया ।  इस मंदिर का निर्माण कार्य अभी भी शेष है ।

इन मंदिरों के अतिरिक्त और कई छोटे-बड़े मंदिर है जिनका अपना महत्व है । यहां एक बावली भी जीर्ण-षिर्ण स्थिति में अव्यस्थित है ।  इस बावली के संबंध में कहा जाता है कि इसमें अथाह जल है ।  इसके जल द्वार बंद करके रखा गया है । इस प्रकार नवागढ़ न केवल धार्मिक दृश्टिकोण से अपितु पुरातात्विक, ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है ।

-रमेशकुमार सिंह चौहान


समकालीन कविताओं में व्यवस्था के विरूद्ध अनुगुंज


साहित्य समाज की दिषा एवं दषा का प्रतिबिम्ब होता है, जिसमें जहां एक ओर सभ्यता एवं संस्कृति के दर्षन होते हैं तो वहीं समाज के अंतरविरोधों के भी दर्षन होते हैं । आदिकाल, भक्ति काल, रीतिकाल से लेकर आधुनिक काल तक साहित्य मनिशियों ने तात्कालिक समाज के अंतर्द्वंद को ही उकेरा है । आधुनिक काल के छायावादी, प्रगतिवादी, प्रयोगवादी और नई कविताओं में उत्तरोत्तर नूतन दृश्टि, नूतन भाव-बोध, नूतन षिल्प विधान से नये सामर्थ्य से कविता सामने आई है, जो जन सामान्य की अनुभूतियों को सषक्त करने की अभिव्यक्ति देती है ।  इसमें अनुभूति की सच्चाई एवं यथार्थवादी दृश्टिकोण का समन्वित रूप है । समकालीन कवितायें इनसे एक कदम आगे जनमानस के उमंग, पीर को जीता ही जीता है, इसके साथ ही वर्तमान व्यवस्थाओं से विद्रोह करने से भी नही चुकता ।
आधुनिक काव्य साहित्य भारत के आजादी के पूर्व जहां राश्ट्रवाद का प्रतीक था वहीं आजादी के पश्चात समाज में व्याप्त अंध विष्वासों, कुरीतियों, और जातिवाद के  उन्मूलन का हथियार बनकर उभरा ।  आजाद भारत के विकास के लिये षिक्षा का प्रचार-प्रसार, नवीन सोच, दलित उत्थान, नारी उत्थन जैसे अनेक विशयों पर जनमानस में अलख जगाने कवितायें दीपक की भांति प्रकाषवान रहीं ।
आधुनिक हिन्दी कविता के इतिहास में 1970 के बाद की कविता को समकालिन कविता के नाम से जाना जाता है । डॉ. अमित षुक्ला के अनुसार - ‘‘जिस प्रकार आधुनिकवाद की अवधारणा किसी एक व्यक्ति या पुस्तक की देन नहीं थी उसे विकसित होने में कोई तीन सौ वर्श का समय लगा था, उसी प्रकार उत्तर आधुनिकवाद बीसवीं षताव्ब्दी में साठ के दषक  के उन मुक्ति आन्दोलनों से निकला है, जिन्होंने व्यक्ति तथा व्यवस्था, अल्प समूह तथा वृहत समाज, विचारों तथा विसंगतियों, नीतियों, राजनीति पर प्रष्न चिन्ह लगा दिया ।‘‘1 यही समकालीन साहित्य का नींव है जिसमें विरोधी विचार हाषिए पर स्थित लोग, नारी वर्ग, दलित जनजातियां, समलैंगिक स्त्री-पुरूश आदि जिन्हें समाज में सक्रियता एवं सांस्कृतिक संवाद के दायरे से बाहर रखा जाता था अब अस्मिता के संघर्श समूह बनकर उभरे । ऋशभ देव षर्मा इस संबंध में कहते हैं कि -‘‘समकालिन कविता ऐसी कविता है जो अपने समय के चलती है, होती है, जीती है । इसे आधुनिकता का अगला चरण भी कहा जा सकता है।  अंतर केवल इतना है कि आधुनिकता बोध के केन्द्र में आधुनिक मनुश्य है और समकालीनता बोध के केन्द्र में समकाल ।‘‘2
समकालिन कविता की आधार भूमि मुख्य रूप से युग परिवेष और उसके जीवन के साथ जुड़े हुये विवषतापूर्ण सवाल है । 20 वी सदी के अंतिम तीन दषकों का भारतीय परिवेष समकालीन कविता की आधारभूमि और प्रेरणा स्रोत है । आज भारतीयों के सामने एक बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है आजादी के इतने वर्शो के बाद भी भारतीय आम आदमी भ्रश्टाचार और असमामानता को झेलने के लिये अभिसप्त क्यो है ? आज गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी भ्रश्टाचार से सामान्य जनता और बुद्धिजीवी वर्ग आहत क्यों हैं ? ‘‘प्रत्येक जागरूक नागरिक की चेतना को झिझोड़ने वाले ऐसे ही सवाल समकालीन कविता के मूलभूत सरोकारों का निर्धारण करते हैं ।‘‘3
समकालिन कविताओं में जीवन के दुर्भरताओं से जुझने का माद्दा है । जीवन पगडंडियों में बिखरे पड़े गरीबी, बेरोजगारी, भ्रश्टाचार, असमानता जैसे कांटों को चुन-चुन कर बुहारा जा रहा है ।

हिन्दी साहित्य में गजानन मुक्तिबोध तथा उनके समकालीन कवि नागार्जुन, षमषेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल को संघर्शषील आधुनिकता का पक्षधर माना गया है ।  संघर्शषील आधुनिकता ही आज के समकालीन कविता है । इस प्रकार मुक्तिबोध को समकालीन कविता का आधार कवि कह सकते हैं । डॉ सूरज प्रसाद मिश्र ने ‘समकालीन हिन्दी कविताओं के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर‘ में मुक्तिबोध, नामार्जुन,  रामदरष मिश्र, केदार नाथ सिंह, विजेन्द्र, सुदामा प्रसाद धूमिल, विनोद कुमार षुक्ल, चंद्रकांत देवताले, षोभनाथ यादव, रमेष चन्द्र षाह, भगवत रावत, विष्वनाथ प्रसाद तिवारी, अषोक वजपेयी, आदि नामो को स्थान दिया है ।  ऐसे तो 1970 के पश्चात के सभी कवियों को समकालीन कविता  के कवि कहे जा सकते हैं ।  किन्तु प्रतिनिधियों कवियों क पहचान के दृश्टिकोण से दिविक रमेष द्वारा सम्पादित कविता संग्रह ‘‘निशेध के बाद‘‘ (1981) में दिविक रमेष, अवधेश कुमार, तेजी ग्रोवर, राजेश जोशी, राजकुमार कुम्भज, चन्द्रकांत देवताले, सोमदत्त, श्याम विमल और अब्दुल बिस्मिल्लाह को सम्मिलित कर इन्हें समकालीन कविता के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया । किन्तु बाद में दिविक रमेष स्वयं लिखते हैं -‘‘मानबहादुर सिंह, गोरख पाण्डेय और ज्योत्सना मिलन जैसे कवियों की भी कविताओं को सम्मिलित किए बिना समकालीन कविता का परिदृश्य अधूरा ही रहेगा । देश की भूमि पर, विशेष रूप से हिन्दी अंचल में ही देखें तो एक साथ कई पीढ़ियां काव्य रचना में तल्लीन दिखाई देती हैं। कुंवर नारायण, रामदरश मिश्र, कैलाश वाजपेयी, माणिक बच्छावत, गंगा प्रसाद विमल, सुनीता जैन आदि सक्रिय हैं तो अशोक वाजपेयी, विष्णु खरे, भगवत रावत, नन्दकिशोर आचार्य, चन्द्रकांत देवताले, अरुण कमल, विश्वरंजन, मंगलेश डबराल आदि के साथ अन्य दो कनिष्ठ और नई पीढ़ियों के भी कितने ही कवि हिन्दी कविता को भरपूर योगदान दे रहे हैं।‘‘4

‘समकालीनता‘ एक व्यापक एवं बहुआयामी षब्द है जो आधुनिकता का आधार तत्व है ।  वास्तव में ‘समकालीनता‘ आधुनिकता में आधुनिक है, जिसके संबंध में रामधारी सिंह दिनकरजी कहते हैं- ‘जिसे हम आधुनिकता कहते हैं वह एक प्रक्रिया का नाम है । यह अंध विष्वास से बाहर निकलने की प्रक्रिया है । यह प्रक्रिया नैतिकता में उदारता बरतने की प्रक्रिया है । यह प्रक्रिया बुद्धिवादी बनने की प्रक्रिया है ।‘‘5 इस प्रक्रिया में आदर्शवाद से हटकर नए मनुष्य की नई मानववादी वैचारिक भूमि की प्रतिष्ठा समकालिन कविताओं में समाज के विभिन्न व्यवस्थाओं के प्रति विरोध के स्वर रूप में अनुगुंजित हैं-
1. राजनीतिक व्यवस्था के विरूद्ध स्वर -
भारतीय समाज में राजनीति का बहु-आयामी महत्व है । समाज और साहित्य का विकास भी समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों से होता रहा है ।  तात्कालिक राजनैतिक परिस्थितियाँ साहित्य को काफी प्रभावित करती हैं ।  समकालीन कवियों के प्रतिनिधि रघुवीर सहाय जीवनासक्त अभिव्यक्तियों की जगह व्यवस्था के प्रति व्यंग्य और यथार्थ का गंभीर विष्लेशण किये हैं उनकी कविताओं में यह मूर्त रूप में देखने को मिलता है ।  रघुवीर सहाय राजनीतिक विद्रूपताओं, पाखण्ड़ों  और झूठ को अपनी कविताओं का विशय बनाये हुये है - ‘नेता क्षमा करें‘ ‘सार और मूल्यांकन‘ उनकी इन्हीं अभिव्यक्ति के  प्रतिबिम्ब हैं । जन-प्रतिनिधियों  के स्तरहीन चरित्र और उनके खोखलेपन, जनता को क्षेत्रवाद, जातिवाद, धर्मवाद आदि में फँसाकर खुद की कुर्सी का साधना करने की प्रवृत्ति,  कुर्सी की सेवा करने की आकंठ लालसा । वृद्ध होकर षिषुओं की तरह कुर्सी के लिये लड़ते रहने के बचपने को देखकर सहायजी इनके चरित्रों को बेनकाब करते हुये कहतें हैं-

‘‘सिंहासन ऊँचा है, सभाध्यक्ष छोटा है
अगणित पिताओं के
एक परिवार के
मुँह बाए बैठे हैं लड़के सरकार के
लूले, काने, बहरे विविध प्रकार के
हल्की-सी दुर्गन्ध से भर गया है सभाकक्ष
सुनो वहाँ कहता है
मेरी हत्या की करूण गाथा
हँसती है सभा, तोंद मटका
उठाकर
अकेले पराजित सदस्य की व्यथा पर‘‘
(‘मेरा प्रतिनिधि‘)

राजनीति ही वह कारक है जो समाज की व्यवस्था को अंदर तक प्रभावित करती है । लोकतंत्र में सरकार का चयन आम जनता के हाथ में है इसी कारण जनता को आगाह कराते हुये नेताओं के चरित्र को अरूण निगम इस प्रकार अभिव्यक्त करते हैं -

‘‘झूठे निर्लज लालची, भ्रश्ट और मक्कार ।
क्या दे सकते हैं कभी, एक भली सरकार ।।
एक भली सरकार, चाहिए-उत्तम चुनिए ।
हो कितना भी षोर, बात मन की ही सुनिए ।
मन के निर्णय अरूण, हमेषा रहें अनूठे ।
देते मन को ठेस, लालची निर्लज झूठे ।।‘‘
(अरूण निगम-‘षब्द गठरिया बांध‘)6

राजनीतिक उठा-पटक और अपनों में ही चल रहे षह-मात पर व्यंग्य करते हुये आज के हास्य-व्यंग्यकार मनोज श्रीवास्तव रूपायीत किया है-

‘‘एक कुत्ते ने दूसरे कुत्ते को,
देखकर जोर से भौंका,
सामने से आ रहा नेता
यह दृष्य देखकर चौंका,
उसने कुत्तों से कहा- ‘‘भाई,
क्यों लड़ते हो ?
कुत्तों ने कहा- नेताजी
लड़ना तो आपका काम है,
हमने तो षर्त लगाई थी,
किसकी आवाज में,
अपने मालिक का नाम है ।‘‘
(‘प्रयास जारी है‘)7

राजनीति पर हर छोटे-बड़े समकालीन कवियों ने कटाक्ष किया है । लोकतंत्र में नेता और मतदाता सिक्के के दो पहलू की तरह हैं, जहां नेताओं का चारित्रिक पतन समकालिकता िंचंतन का विशय है वहीं मतदाताओं के लालची प्रवृत्ति भी सांगोपांग चिंतनीय है, जिसका प्रतिबिम्ब समकालीन कविता में सहज सुलभ है ।

2. अमानवीयता के विरूद्ध स्वर -
समाज का अस्तित्व मानव और मानवता से है । नव-पूंजीवादी दौर में मानवतावादी मूल्य समाज से लगभग गायब होते जा रहे हैं । मनुश्य आत्मकेंद्रित होते जा रहा है । अपने समाजिक सरोकार को आज का मनुश्य विस्मृत कर बैठा है । इस पीड़ा को रघुवीर सहायजी ‘दुनिया‘ षीर्शक कविता में व्यक्त करते हैं-

‘‘न कोई हँसता है न कोई रोता है
न कोई प्यार करता है न कोई नफरत
लोग या तो दया करते हैं या घमंड
दुनिया एक फफंदियाई हुई से चीज है ।‘‘

समाज का कुछ वर्ग इतना निरंकुष हो गया है कि लोग भीड़ में भी एकाकी पन को जीने के लिये विवष हैं । भौतिकवाद इतना पसरा है कि हर कोई इसके आगोष में खोये-खोये से लगते हैं ।  इसे मुकंद कौषलजी के इन पंक्तियों में महसूस किया जा सकता है-



‘‘ऊँचे ऊँचे पेड़ बहुत हैं
लेकिन छाँव नही
दूर तलक केवल पगडंड़ी, कोई गाँव नही

ओढ़ चले आँचल धरती का
बाहों में अम्बर
मुठ्ठी में हैं आहत खुषियां
किरणें कांवर भर
चूर-चूर अभिलाशाओं को, मिलती ठाँव नहीं ।‘‘
(‘सिर पर धूप आँख में सपने‘)8

सामाजिक सरोकार का ताना-बाना इस कदर उलझ गया है कि आपसी रिष्ते भी स्वार्थ केन्द्रित प्रतित हो रहे हैं । माँ-बाप के असहायपन का चित्रण करते हुये राजेष जैन ‘राही‘ कहते हैं -

‘लाठी जिसको जग कहे, पुत्र कहाँ वो हाय ।
वृद्ध हुए माँ बाप तो, बेटा लठ्ठ बजाय ।।

बिखरे-बिखरे से सपन, बिखरी सी हर बात ।
बेटा कुछ सुनता नही, कह कर हारे तात ।।‘‘
(‘पिता छाँव वटवृक्ष की‘)9

मानवता समाज की रीढ़ की हड्डी है । समाज सामाजिक सरोकार के बल पर ही संचालित है । समाज को तोड़ने वाली व्यवस्था के विरूद्ध समकालीन कविता उठ खड़ी हुई है ।

3. भूखमरी और दीनता पर व्यवस्था के विरूद्ध स्वर-

‘इक्कीसवीं सदी भारत का होगा‘ यह दिव्या स्वप्न देखने वालों को देष के उस अधनंगे भूखे लोगों की ओर ताकने का अवसर ही नहीं मिल पाता जो दो जून के रोटी के लिये मारे-मारे फिर रहें हैं । भारत के समग्र विकास के लिये आवष्यक है कि इस तबके को झांका जाये । समकालीन कविता मानवतावादी है, पर इसका मानवतावाद मिथ्या आदर्श की परिकल्पनाओं पर आधारित नहीं है। उसकी यथार्थ दृष्टि मनुष्य को उसके पूरे परिवेश में समझने का बौद्धिक प्रयास करती है। समकालीन कविता मनुष्य को किसी कल्पित सुंदरता और मूल्यों के आधार पर नहीं,बल्कि उसके तड़पते दर्दों और संवेदनाओं के आधार पर बड़ा सिद्ध करती है, यही उसकी लोक थाती है। केदारनाथ सिंहजी अपनी प्रसिद्ध कविता ‘रोटी‘ में इसकी महत्ता प्रतिपादित करते हुये कहते हैं-

‘‘उसके बारे में कविता करना
हिमाकत की बात होगी
और वह मैं नहीं करूंगा

मैं सिर्फ आपको आमंत्रित करूँगा
कि आप आयें और मेरे साथ सीधे
उस आग तक चलें
उस चूल्हें तक जहां पक रही है
एक अद्भूत ताप और गरिमा के साथ
समूची आग को गंध बदलती हुई
दुनिया की सबसे आष्चर्यजनक चीज
वह पक रही है ।

भूखमरी समाज के असन्तुलित व्यवस्था की परिणीति है, समकालीन कविता अपने जन्म से ही इस व्यवस्था के विरूद्ध मुखर है, सर्वेष्वर दयाल सक्सेना की ये पंक्तियां इसे अभिप्रमाणित करती हैं-

‘‘गोली खाकर
एक के मुँह से निकला -
’राम’।

दूसरे के मुँह से निकला-
’माओ’।

लेकिन तीसरे के मुंह से निकला-
’आलू’।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
कि पहले दो के पेट
भरे हुए थे।‘‘
-सर्वेष्वर दयाल सक्सेना, (पोस्टमार्टम की रिपोर्ट)10

भूखमरी और कुरीति पर एक साथ प्रहार करते हुये व्यंगकार कवि पुश्कर सिंह राज व्यंग्य करते हुये कहते हैं -

अधनंगा रह जो पूरी जिन्दगी खपाता है
उसकी लाष पे तू कफन चढ़ाता है ।

अभावों में रह जो भूख से मर जाता है
मौत पे उसके तू मृत्यु-भोज कराता है ।।
(‘ये मेरा हिन्दुस्तान है‘)11


4. भ्रश्टाचार के विरूद्ध स्वर -
समकालीन कविता वास्तव में व्यक्ति की पीड़ा की कविता है। अपने पूर्ववर्ती कविता की भांति यह व्यक्ति के केवल आंतरिक तनाव और द्वंद्वों को नही उकेरता अपितु यह व्यापक सामाजिक यथार्थ से जुड़ाव महसूस कराता है। जिंदगी की मारक स्थितियों को, उसकी ठोस सच्चाइयों को और राजनीतिक सरोकारों को भावुक हुये बिना सत्य का साक्षात्कार कराती है । प्रषासनिक तंत्र में भ्रश्टाचार का विश जन सामन्य को जीने नही दे रही है । स्थिति इतनी विकट है कि सुरजीत नवदीप माँ दुर्गे से कामना करते हुये कहते हैं-

‘माँ दुर्गे
सादर पधारो,
बुराइयों के
राक्षसों को संहारो ।
मँहगाई
पेट पर
पैर धर रही है,
भ्रश्टाचार की बहिन
टेढ़ी नजर कर रही हैं ।‘‘
-सुरजीत नवदीप (रावण कब मरेगा)12

भ्रश्टाचार समाज की वह कुरीति है जो समाज को अंदर से खोखला कर रही है । भ्रश्टाचार का जन्म कुलशित राजनीति के कोख से हुआ है-

‘झूठ ढला है-सिक्कों सी राजनीति-टकसाल है
पूरी संसद-चोरों और लुटेरों की-चउपाल है ।।‘‘
पं. षंकर त्रिपाढ़ी ‘ध्वंसावषेश‘ (‘नवगीत से आगे....‘)13

आज की व्यवस्था इस प्रकार है कि- भ्रश्टाचार कहां नही है ? कौन इससे प्रभावित नही है ? आखिर यह व्यवस्था इतनी पल्लवीत क्यों है ? इन प्रष्नों का उत्तर समकालीन कवि का धर्म इस प्रकार व्यक्त करता है -

‘‘कहाँ नहीं है भ्रष्टाचार, मगर चुप रहते आये
आवश्यकता की खातिर हम, सब कुछ सहते आये
बढ़ा हौसला जिसका, उसने हर शै लाभ उठाया
क्या छोटे, क्या बड़े सभी, इक रौ में बहते आये
-गोपाल कृष्ण भट्ट ’आकुल’14





5. बेरोजगारी के विरूद्ध स्वर -

‘‘21वीं सदी की षिक्षा उपभोक्ता वाद को बढ़ावा देने वाली होती जा रही है ।  बाजारवाद षिक्षा परिसरों में भी पसरता जा रहा है । हम ऐसी षिक्षा के दल-दल में धंस रहे हैं, जो हमें हृदयहीन, लाचार और आत्महीन बना रही है ।  हमारे आदर्ष हमसे छूटते जा रहे हैं । हम लगातार आत्मनिर्भर बनने की कोषिष में परजीविता की ओर बढ़ते जा रहे हैं ।  भारतीय आम जनता परम्परागत षिक्षा को ही रोजगार का साधन बनाती है, लेकिन इस दौर में स्थिति बिल्कुल बदल चुकी है । इस तरह की आषा रखने वाले युवाओं को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है ।‘‘15  जीवन निर्वाह के लिये हाथों में काम चाहिये । कहा भी गया है- ‘खाली दिमाग षैतान का‘ काम के अभाव में ही हुआ राश्ट्र के मुख्य धारा से पृथ्क अपना भिन्न पथ तैयार करने विवष हो जाते हैं-

‘डिगरियां लिए घूमता है आम आदमी
समस्याओं से जूझता है आम आदमी
इसलिये आत्मघाती बन रहा है आम आदमी ।‘‘
डॉ. प्रेम कुमार वर्मा (‘उद्गार‘)16

बेरोजगारी युवा मन को कुण्ठित कर देता है, वह व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करने लगता है । एक युवा के दर्द को युवा कवि इस प्रकार व्यक्त करता है-

‘‘डिग्रियों के बोझ से लदा हुआ हूँ मैं
याने कि प्रजातंत्र का गधा हुआ हूँ मैं

पकर  ज्ञान  मूर्ख  कालिदास  हो  गए
पढ लिखकर कालिदास से बेरोजगार हूँ मैं

नोचते खसोटते चारों तरफ से लोग
जैसे किसी बाढ़ का चन्दा हुआ हूँ मैं
-उदय मुदलियार17

6. अस्मिता का स्वर-
जब से मानव की सभ्यता-संस्कृति विकसित हुई है तब से अस्मिता का स्वर ध्वनित है किन्तु जैसे-जैसे समाज का विकास क्रम आगे बढ़ता गया यह स्वर अधिक घनीभूत होती गई । वैष्वीकरण के इस दौर में किसी भी वर्ग, समुदाय की उपेक्षा संभव नही है । अस्मिता का स्वर अधिकार, वजूद, पहचान, अस्तित्व, गरिमा, न्याय आदि विभिन्न रूपों में, विविध आयामों में सामाजिक-सांस्कृतिक, भौगोलिक, नैसर्गिक, जैविक, धर्म, जाति-प्रजाति, के रूप में प्रस्फूटित होते आया है । समकालीन अस्मितावादी आंदोलन, सिर्फ  अपने वजूद की पहचान या एहसास कराने का आंदोलन नहीं है, बल्कि यह भागीदारी, अधिकार, न्याय, स्वतंत्रता और मैत्री का आंदोलन है।
समकालीन कविता में असाधारण संतुलन के कवि मंगलेष डबराल दलित, षोशित की दषा पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुये कहते हैं-


दूर एक लालटेन जलती है पहाड़ पर
एक तेज आंख की तरह
टिमटिमाती धीरे-धीरे आग बनती हुई
देखो अपने गिरवी रखे हुए खेत
बिलखती स्त्रियों के उतारे गये गहने
देखो भूख से बाढ़ से महामारी से मरे हुए
सारे लोग उभर आये हैं चट्टानों से
दोनों हाथों से बेशुमार बर्फ़ झाड़कर
अपनी भूख को देखो
जो एक मुस्तैद पंजे में बदल रही है
जंगल से लगातार एक दहाड़ आ रही है
और इच्छाएं दांत पैने कर रही हैं
पत्थरों पर।
(पहाड़ पर लालटेन)18

औद्योगिक पूँजीवाद की जरूरत का एक प्रतिफल यह निकला कि -ं आदिवासी आदिकाल से जंगल को अपना घर समझते आ रहे थे, वे अब जंगल बदर होने लगे, मातृभूमि से काट दिये जाने लगे। समकालीन कवि डॉ. संजय अलंग, जिलाधिकारी के पद पर कार्यरत  रहते हुये जीवन के  इस गहरी पीड़ा को इन षब्दों में व्यक्त करते हैं -
बस्तर में वन रक्षा के लिए हुआ था-कुई विद्रोह
मिले संज्ञा इसे विद्रोह की ही,
कथित सम्यता के लिए बना मील का पत्थर
प्रेरणा पाई ऊँचे सभ्य लोगो ने इससे
अब बदले तरीके, विधि बदली और अंदर तक घुसे
अब नही करते हरिदास-भगवानदास जैसी क्रूर ठेकेदारी
सभ्य रहो, मजदूरी दो, विकास दिखाओ
पैसा फेंको, तमाषा देखो, अभी तो पूरा वन, पूरा खनिज
पूरे आदिवासी श्रमिक पड़े है-खोदने को दोहन को ।
-कुई विद्रोह-बस्तर 1859 (सुमन)19

अस्मिता के स्वर को प्रोत्साहित करते हुये दार्षनिक दृश्टिकोण से षंकर लाल नायक अपनी बात इस प्रकार कहते हैं-

‘हर बादल बरसे नही, बरस गया बरसात ।
जो दुख में रोते रहे, उसकी कहां औकात ।।
(‘सुख दुख‘‘ दोहा संग्रह)20

समकालीन कविता सक्षम, एवं सकारात्मक दृष्टि से संपन्न कविता है जिसने एक ओर नकारात्मकता या निषेध से मुक्ति दिलाई है तो दूसरी ओर गहरी मानवीय संवेदना से कविता को जागृत रहकर समृद्ध किया है । अपनी भूमि को सांस्कृतिक मूल्यों, स्थानीयता, देसीपन और लोकधर्मिता, स्थितियों की गहरी पहचान, अधिक यथार्थ, ठोस और प्रामाणिक चरित्र, मानवीय सत्ता और आत्मीय संबधों-रिश्तों की गरमाहट से लहलहा दिया है ।

संदर्भ ग्रंथ-
1. साहित्य परम्परा और सामाजिक सरोकार-डॉ अमित षुक्ला- पृश्ठ 81
2. सृजनगाथा-समकालीन कविताः सरोकार और हस्ताक्षर-ऋशभ देव षर्मा
3. वही
4. समकालिन कविता-दिविक रमेष
5. आधुनिकता की भाशा और मुक्तिबोध-राखी राय हल्दर- पृश्ठ 17
6. ‘षब्द गठरिया बांध‘ छंद संग्रह-अरूण निगम, अंजुमन प्रकाषान-पृश्ठ 79
7. ‘प्रयास जारी है‘ कविता संग्रह-मनोज श्रीवास्तव वैभव प्रकाषन-पृश्ठ 50
8. ‘सिर पर धूप आँख पर सपने‘ गीत संग्रह-मुकुद कौषल, वैभव प्रकाष-पृश्ठ 19
9. ‘पिता छाँव वटवृक्ष की‘ दोहा संग्रह- राजेष जैन ‘राही‘, प्रकाषक नवरंग काव्य मंच-पृश्ठ 25 एवं 37
10. ‘‘कविता कोष-सर्वेष्वर दयाल सक्सेना‘‘ से साभार
11. ये मेरा हिन्दुस्तान है‘ कविता संग्रह-पुश्कर सिंह राज
12. ‘रावण कब मरेगा‘ कविता संगह-सुरजीत नवदीव
13. ‘‘नवगीत से आगे‘ पं षंकर त्रिपाठी ‘ध्वंसावषेश‘ पृश्ठ-44
14. ‘‘कविता कोष-गोपाल कृष्ण भट्ट ’आकुल’‘ से साभार
15. साहित्य परम्परा और सामाजिक सरोकार-डॉ अमित षुक्ला- पृश्ठ 109
16. ‘उद्गार‘ कविता संग्रह- डॉ प्रेम कुमार वर्मा पृश्ठ-74
17. न्यू ऋतंभरा कुम्हारी साहित्य संग्रह का 13 वां अंक
18. ‘‘कविता कोष-मंगलेष डबराल‘‘ से साभार
19. ‘सुमन‘ सम्पादक डॉ सत्यनारायण तिवारी ‘हिमांषु‘ पृश्ठ-22
20. ‘सुख-दुख‘ षंकर के दोहे-षंकर लाल नायक